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सालों से देवता मानकर गांव वाले जिस पत्थर की कर रहे थे पूजा, वह निकला डायनासोर का अंडा... जानें कहां का है पूरा मामला

Dinosaur Egg Worship: मध्य प्रदेश के धार जिले के पाडल्या गांव के लोग एक गोलाकार पत्थर को देवता मानकर वर्षों से पूजते आ रहे थे. लेकिन गांव वाले जिस पत्थर को वर्षों से पूज रहे थे वो किसी जीव का अंडा निकला.

Gyanendra Tiwari
सालों से देवता मानकर गांव वाले  जिस पत्थर की कर रहे थे पूजा, वह निकला डायनासोर का अंडा... जानें कहां का है पूरा मामला

हाइलाइट्स

  • गांव वाले जिस पत्थर की पूजा कर रहे थे वह डायनासोर का अंडा निकला.
  • गांव वाले पत्थर के सामने देते थे बकरे और मुर्गे की बली.

Dinosaur Egg Worship: स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी का एक गाना है मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानो तो बहता पानी. इस कहावत की तर्ज पर लोग पत्थर को देवता समझकर पूजते हैं. मानों तो देवता ना मानो तो पत्थर. कुछ इसी तरह से मध्य प्रदेश के धार जिले के पाडल्या गांव के लोग एक गोलाकार पत्थर को देवता मानकर वर्षों से पूजते आ रहे थे. लेकिन गांव वाले जिस पत्थर को वर्षों से पूज रहे थे वो किसी जीव का अंडा निकला. अंडा वो भी किसी आम जीव का नहीं बल्की डायनासोर का अंडा. ये अंडा करोड़ों वर्ष पूर्व डायनासोर का बताया जा रहा है. 


17 साल पहले मिले थे पत्थर 

 

17 पहले डायनासोर का ये अंड खेत की जुताई के दौरान मिला था. तब लोगों ने इसे पत्थर समझकर इसकी पूजा शुरू कर दी थी. लोग पत्थर को 'भीलट बाबा' मानकर पूजने लगे थे.जब विशेषज्ञों को इस पत्थर के बारे में पता चला और उन्होंने आकर इस पत्थर की जांच की तब जाकर पता चला कि ग्राम्रीम वर्षों से जिस पत्थर को भीलट बाबा मानकर पूज रहे थे दरअसल वो डायनासोर का अंडा है. 

 

 दी जाती थी बकरे और मुर्गे की बली

 

डायनासोर के अंडे को गांव वाले भीलट बाबा मानकर सिर्फ पूजा ही नहीं करते थे. वो अपने देवता को खुश करने के लिए बकरे और मुर्गे की बली भी चढ़ाते थे.  मध्य प्रदेश के धार जिले के पाडल्या गांव के लोग ही नहीं बल्कि आसपास के गांव के लोगों के बीच भीलट बाबा प्रचलित देवता हो गए थे.दूर दराज से लोग पत्थर की पूजा करने आते थे. 


पत्थर को देवता मानकर पूजा करने के बारे में बताते हुए पाडल्या गांव के एक ग्रामीण ने बताया कि इन गोलाकार पत्थर जैसी वस्तु को काकर यानी खेत का भैरव देवता के रूप में पूजा जाता है. ये देवता उनकी रक्षा करते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि कुल देवता उनकी रक्षा करते हैं और हर विपरीत स्थिति में  उनको बचाते हैं.

 

जांच में हुआ खुलासा

जानकारी मिलने पर कुछ दिनों पहले लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियो साइंस (Birbal Sahni Institute of Paleo Science) की टीम  मध्य प्रदेश के धार जिले में पहुंच कर पत्थर की रिसर्च की तो पता चला कि गांव वाले जिन पत्थरों को बीते 17 साल से पूज रहे हैं असल में वो करोड़ों साल पुराने डायनासोर के अंडे हैं. पत्थरों में जीवाश्म है.जांच में पता चला कि ये अंडे टिटानो-सौरन प्रजाति के डायनासोर के हैं. इन पत्थरों का व्यास करीब 18 सेंटीमीटर बताया जा रहा है. 

पाडल्या गांव ही नहीं बल्कि कई गांव में इस तरह के पत्थर मौजूद हैं. लोग उन पत्थरों को देवता समझ कर उनकी पूजा करते हैं. खेड़ापूरा और पटेलपुरा इलाके में भी ऐसे पत्थरों की पूजा की जाती है. 


पहले भी मिल चुके हैं डायनासोर के अंडे


धार जिले की कुक्षी तहसील का यह क्षेत्र डायनासोर के अंडों के लिए ही जाना जाता है. इससे पहले भी इस इलाके में डायनासोर के 256 अंडे मिल चुके हैं. इन सभी पत्थरों के आकार 15 से 16 सेंटीमीटर के आसपास हैं. कई सालों से वैज्ञानिक इन पत्थरों की जांच-पड़ताल कर रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि 6 सौ करोड़ साल पहले डायनासोरों का क्षेत्र हुआ करता था. 

2011 में इस इलाके में एक डायनासोर पार्क बनाया गया था. इस पार्क आसपास के गांव में मिले जीवाश्म को रखा जाता है. दशकों पहले मध्यप्रदेश के ही भेड़ाघाट में डायनासोर का पूरा सबूत कंकाल भी मिला था. अभी फिलहाल ये कंकाल मुंबई स्थित नेशनल म्यूजियम में रखा है.