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आखिर INDIA गठबंधन पर क्यों लाल-पीली हो रही हैं ममता, Inside Story

Mamata Banerjee Challenge: ममता बनर्जी अपने एक बयान के चलते इन दिनों फिर से चर्चे में हैं. बीते दिनों ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को चुनौती देते हुए कहा है कि किसी मे दम है तो तोड़ दे मोदी के बनाये हुए अभेद काशी अजेय बनारस के किले को.

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Tushar Srivastava
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Mamata Banerjee Challenge: ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस को छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. उस समय पश्चिम बंगाल में सत्ता के दो ही ध्रुव थे एक कम्युनिस्ट तो दूसरा कांग्रेस. इसलिए ममता बनर्जी वाजपेयी सरकार की प्रमुख सहयोगी बनी रहीं. उन्हें लगा कि भाजपा के सहयोग से वह कम्युनिस्टों के इस गढ़ को तोड़ देंगी और धीरे धीरे ममता अपनी ताकत बढ़ाने लगी. इसके बाद वह मनमोहन सरकार में मंत्री बनी जिसकी सिर्फ एक वजह थी कि सत्ता में रह कर ही तृणमूल कांग्रेस को मजबूत बना सकती है और हुआ भी वही. एक दिन ऐसा आया कि ममता ने इस लाल दुर्ग को तोड़ दिया और आज बंगाल की राजनीति ममता के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है.

ममता को अब भगवा से चुनौती

इसके साथ ही ममता को अब भगवा से चुनौती मिलने लगी तो उन्होंने स्वाभाविक तौर पर बंगाल में बीजेपी को अपना दुश्मन मान लिया. लेकिन कब तक, वह भी तब जब तृणमूल के नेताओं के गिरेबान कंठ तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हो और वही ईडी झारखंड तक पहुंच गई है ये बात ममता भी जानती है कि ईडी का शिकंजा 2024 लोकसभा के चुनाव तक रुका है क्योंकि भाजपा भी अजेय रहना चाहती है इसलिए ममता भी आज कल बीजेपी के लिए अपनी ममता जाहिर कर दे रही है.

इंडिया गठबंधन को ममता की चुनौती

ममता ने इंडिया गठबंधन को चुनौती देते हुए कहा है कि किसी मे दम है तो तोड़ दे मोदी के बनाये हुए अभेद काशी अजेय बनारस के किले को. आइए समझते है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने बनारस को ही क्यों चुना इसके कई कारण है पहला अपनी गुजराती छवि से बाहर निकल देश के सर्वाधिक लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तरप्रदेश को अपना घर बनाना. बनारस पूर्वांचल की ऐसी सीट है जो उत्तरप्रदेश के पूर्वांचली जिलों के साथ साथ बिहार के सीमावर्ती जिलों तक अपना प्रभाव रखती है चाहे वो भाषा के स्तर पर हो या खानपान या संस्कृति सब एक जैसा है. मोदी ने बनारस को भाजपा के लिए एक ऐसा किला बना दिया जिसे तोड़ पाना अब नामुमकिन सा है. वैसे राजनीतिक नासमझी में केजरीवाल ने एक बार मोर्चा लिया था 3 लाख मुस्लिम वोटर और 2 लाख वैश्य वोटरों के सहारे.करारी हार के बाद केजरीवाल को ये एहसास हुआ कि उन्होंने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली.

बनारस की सियासत पर धर्म का प्रभाव

बनारस की सियासत पर जातिगत प्रभाव से ज्यादा असर धर्म का देखने को मिलता है और उसी में राम मंदिर का तड़का इसको और अपराजेय बनाता है. बनारस में करीब 3 लाख मुस्लिम वोटर तो इतने ही ब्राह्मण मतदाता भी है. 3 लाख से ज्यादा गैर यादव ओबीसी मतदाता, दो लाख वैश्य, 2 लाख कुर्मी मतदाता है. वैसे इन सब जातिगत समीकरणों को तोड़ते हुए हिन्दू ध्रवीकरण जो सिर्फ मोदी के नाम पर होता है.

वैसे कहा जाता है कि दूसरा पीएमओ बनारस में बैठता है इसीलिए तो आज बनारस का इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से आगे बढ़ रहा है और तो और बनारस का फंड भी अन्य जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा है. फिर भी 2024 लोकसभा चुनाव में बनारस के कुछ मुद्दे  जैसे स्मार्ट सिटी के नाम पर जमीनों का अधिग्रहण, विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए मंदिरों को तोड़ा जाना, गंगा सफाई, बुनकरों पर रोजगार का संकट कुछ मामले भाजपा के लिए संकट जरूर पैदा कर सकते है.

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First Published : 03 February 2024, 03:29 PM IST