नई दिल्ली: महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए नया कदम उठाया गया है. शुक्रवार को विधानसभा में पेश 'महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन बिल 2026' में सख्त नियम बनाए गए हैं, ताकि जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच से कोई धर्म न बदले. सरकार का कहना है कि यह संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, साथ ही कमजोर वर्गों को बचाता है. यह विधेयक अन्य राज्यों की तर्ज पर है, लेकिन इसमें बच्चे के धर्म को लेकर अनोखा प्रावधान जोड़ा गया है.
अगर अवैध तरीके से धर्म बदला गया और उससे बच्चा पैदा हुआ, तो बच्चा मां के मूल धर्म का माना जाएगा. इससे 'लव जिहाद' जैसे आरोपों पर लगाम लगाने का प्रयास दिखता है. विधेयक कैबिनेट से 5 मार्च को मंजूर होकर विधानसभा पहुंचा.
विधेयक में अवैध धर्मांतरण के लिए 7 साल तक की जेल और 1 लाख रुपये तक जुर्माना है. अगर मामला नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अक्षम या एससी/एसटी से जुड़ा हो, तो सजा 7 साल और जुर्माना 5 लाख तक बढ़ सकता है. सामूहिक धर्मांतरण पर भी भारी दंड. उल्लंघन गैर जमानती अपराध माना जाएगा. कुछ मामलों में यह सजा 10 साल भी हो सकती है और जुर्माने की रकम 7 लाख हो सकती है.
धर्म बदलने वाले को 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या सक्षम अधिकारी को नोटिस देना होगा. परिवर्तन के बाद घोषणा पत्र भी जमा करना अनिवार्य. ऐसा न करने पर परिवर्तन अमान्य हो जाएगा. परिवार के सदस्य शिकायत कर सकते हैं, जिस पर एफआईआर दर्ज होगी.
अवैध धर्मांतरण से हुए विवाह या संबंध से जन्मे बच्चे को मां के शादी से पहले के धर्म का माना जाएगा. बच्चे को संपत्ति में हिस्सा, भरण पोषण और कस्टडी का अधिकार रहेगा. आमतौर पर कस्टडी मां के पास रहेगी, सिवाय अदालत के फैसले के. पुनर्वास सहायता भी मिलेगी.
यह विधेयक पारित होने पर महाराष्ट्र दसवां राज्य बनेगा जहां अवैध धर्मांतरण विरोधी कानून होगा. पहले से उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक समेत कई राज्यों में ऐसे कानून हैं. महाराष्ट्र का बिल विशेष रूप से विवाह से जुड़े मामलों पर फोकस करता है.
सरकार का दावा है कि कानून धार्मिक स्वतंत्रता बचाएगा और जबरन परिवर्तन रोकेगा. विपक्ष इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला मान रहा है. विधेयक चर्चा के बाद पारित होगा, फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलेगी. यह कदम सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की दिशा में देखा जा रहा है.