नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों के बीच शक्ति संतुलन एक मौलिक सिद्धांत है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस पर नई बहस छेड़ दी है. शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने संसद में न्यायपालिका की वर्तमान कार्यप्रणाली और एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक मामले पर गंभीर चिंता व्यक्त की. सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादास्पद अध्याय के लेखकों के विरुद्ध दिए गए कड़े दंडात्मक निर्देशों को उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन और 'न्यायिक अतिरेक' की स्पष्ट संज्ञा दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के उस अध्याय पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जिसमें न्यायिक भ्रष्टाचार का उल्लेख था. अदालत ने एनसीईआरटी के हलफनामे पर नाराजगी जताते हुए निर्देश दिया कि लेखकों की टीम को तुरंत सेवामुक्त किया जाए. साथ ही, भविष्य में उन्हें किसी भी सरकारी वित्त पोषित कार्य में शामिल होने से प्रतिबंधित कर दिया गया.
सांसद चतुर्वेदी ने कहा कि अध्याय हटाना समझ में आता था, लेकिन कार्रवाई अब दंडात्मक हो गई है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सोशल मीडिया की आलोचना पर भी अदालत कार्रवाई करेगी, तो यह खतरनाक होगा. एनसीईआरटी की माफी के बाद भी लेखकों को दंडित करना उनकी नजर में न्यायपालिका की संवेदनशीलता और उसके 'अतिरेक' का उदाहरण है.
उन्होंने तर्क दिया कि राजनेताओं और पुलिस की तरह न्यायपालिका भी जांच के दायरे में होनी चाहिए. भ्रष्टाचार पर चर्चा होने पर अदालतों की संवेदनशीलता लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध है. सांसद के अनुसार, लोकतंत्र में कोई भी संस्थान सार्वजनिक संवीक्षा से परे नहीं होना चाहिए. न्यायपालिका को भी स्वयं को कानून की नजर में समान और जवाबदेह रखना होगा.
सांसद ने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले का उल्लेख किया, जिनके परिसर से पिछले साल जली हुई नकदी मिली थी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर जांच हुई और उनका तबादला भी किया गया. उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस अभी भी संसद में लंबित है. यह मामला न्यायिक भ्रष्टाचार के आरोपों की गंभीरता और उच्च न्यायिक पदों पर पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है.
अंत में, चतुर्वेदी ने आग्रह किया कि शासन के तीनों अंग कानून के तहत समान रहें. उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को खुद को संविधान से ऊपर नहीं मानना चाहिए. तीनों अंगों को अपनी सीमाओं का सम्मान करते हुए जनता के प्रति पारदर्शी होना चाहिए ताकि देश का लोकतांत्रिक ढांचा संतुलित, निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त बना रहे.