उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संचालन को लेकर बड़ा कदम उठाया है. राज्य सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम 2025 में संशोधन करते हुए नया अध्यादेश लागू कर दिया है. राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू हुए उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम संशोधन अध्यादेश 2026 के तहत अब नियमों का उल्लंघन करने वाले मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के खिलाफ पहले से अधिक सख्त कार्रवाई की जा सकेगी.
सरकार ने अधिनियम की कुछ धाराओं में संशोधन किया है. पहले अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम को उत्तराखंड बोर्ड से मंजूरी लेना अनिवार्य था. संशोधन के बाद इस शर्त को हटा दिया गया है. इसी तरह एक अन्य धारा में भी बोर्ड की स्वीकृति से जुड़ा प्रावधान समाप्त कर दिया गया है, जिससे प्रशासनिक प्रक्रिया को सरल बनाया गया है.
संशोधित कानून के अनुसार यदि कोई संस्थान बिना आवश्यक मान्यता के धार्मिक शिक्षा संचालित करता है या अधिनियम की मान्यता संबंधी शर्तों का उल्लंघन करता है, तो जांच के बाद प्राधिकरण सख्त कार्रवाई कर सकेगा. ऐसे मामलों में संस्थान को बंद किया जा सकता है और उसके संचालकों पर पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा.
नए संशोधन के तहत यदि किसी संस्थान में गंभीर अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो वहां सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है. यदि जांच के दौरान किसी प्रकार के आपराधिक कृत्य के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत एफआईआर भी दर्ज कराई जा सकेगी. हालांकि कार्रवाई से पहले संस्थान के संचालकों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा.
संशोधित अधिनियम के अनुसार अब मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता बनाए रखने के लिए कई अनिवार्य शर्तों का पालन करना होगा. संस्थान का संचालन संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किया जाना चाहिए. संस्थान का संबद्धता निर्धारित परिषद या बोर्ड से होना जरूरी होगा. प्रबंधन की सोसायटी का विधिवत पंजीकरण होना चाहिए. संस्थान की भूमि संबंधित सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के नाम दर्ज होनी चाहिए. सभी वित्तीय लेनदेन बैंक खाते के माध्यम से किए जाएंगे. प्रबंधन में अधिकांश पद अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों के पास होने चाहिए. साथ ही संस्थान किसी छात्र या कर्मचारी को किसी धार्मिक गतिविधि में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं कर सकेगा.