नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने कुछ ही महीनों में पूरी दिशा बदल दी. शुरुआत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाने से हुई, लेकिन अब संघर्ष का सबसे अहम केंद्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य बन चुका है. इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर दिखाई देने लगा. 28 फरवरी 2026 से जुलाई 2026 तक घटनाक्रम लगातार बदलता रहा. सैन्य कार्रवाई, जवाबी हमले, संघर्ष विराम, कूटनीतिक बातचीत और फिर नए हमलों ने इस विवाद को नई दिशा दी. आइए जानते हैं कि किस तरह यह संघर्ष परमाणु ठिकानों से आगे बढ़कर तेल आपूर्ति और समुद्री नियंत्रण की लड़ाई में बदल गया.
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त अभियान के तहत ईरान के परमाणु परियोजनाओं, मिसाइल ठिकानों, कमांड सेंटर और सैन्य अड्डों पर बड़े हमले किए. ट्रंप प्रशासन का दावा था कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत भी बताई गई. इससे पहले कई दौर की बातचीत हुई थी, लेकिन किसी समझौते तक पहुंचा नहीं जा सका.
हमलों के बाद ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन के जरिए जवाबी कार्रवाई की. इजरायल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी क्षेत्र के कुछ ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसी दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमले शुरू हुए. यह समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार के लिए अहम माना जाता है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने लगा.
मार्च में ईरान ने होर्मुज को बंद घोषित किया, जिसके बाद कई जहाज प्रभावित हुए. अमेरिका ने जवाब में ईरानी नौसेना के ठिकानों पर कार्रवाई की. अप्रैल की शुरुआत में पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से दो सप्ताह के संघर्ष विराम की घोषणा हुई. इस दौरान इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत भी हुई, लेकिन होर्मुज को लेकर कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी.
जून में पाकिस्तान की मध्यस्थता से एक समझौता ज्ञापन (MoU) सामने आया. इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने, अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, लेबनान में संघर्ष रोकने और प्रतिबंधों में कुछ राहत देने जैसे बिंदु शामिल थे. साथ ही परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिनों के भीतर आगे बातचीत करने पर सहमति बनी. इसके बाद जहाजों की आवाजाही शुरू हुई, हालांकि हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके.
जुलाई की शुरुआत में होर्मुज क्षेत्र में तीन जहाजों पर नए हमलों के बाद अमेरिका ने इसे समझौते का उल्लंघन बताया और जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी. अमेरिकी हमले ईरानी रडार, एंटी-शिप मिसाइल ठिकानों, कमांड सेंटर और नौसैनिक संसाधनों पर केंद्रित रहे. जवाब में ईरान ने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि फिलहाल संघर्ष का सबसे अहम केंद्र परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक तेल आपूर्ति बन चुका है.