प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब एक नया मामला सामने आया है. इस बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के ऑनलाइन मूल्यांकन सिस्टम में गंभीर गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं. एक सत्रह वर्षीय पीड़ित छात्र ने इन तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का पूरा ब्यौरा संसद की एक स्थायी समिति के सामने पेश किया है.
सीबीएसई की बारहवीं कक्षा के छात्र सार्थक सिद्धांत ने संसद भवन एनेक्स में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में अपनी बात रखी. उन्होंने शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की संसदीय स्थायी समिति के सदस्यों के समक्ष एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया. सार्थक का दावा है कि उन्होंने सेंट्रल पब्लिक प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर मौजूद आधिकारिक टेंडर दस्तावेजों की बहुत ही बारीकी से पड़ताल की है. इसके बाद ही उन्होंने इस पूरे मामले को सार्वजनिक करने का साहसिक कदम उठाया.
सार्थक सिद्धांत ने अपनी जांच के आधार पर आरोप लगाया है कि सीबीएसई ने 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) सिस्टम का काम संभालने वाली निजी कंपनी 'कोएम्प्ट एजुटेक' को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए अपने मूल नियमों में बदलाव किए. उन्होंने अलग-अलग टेंडर प्रपत्रों की तुलना करते हुए कम से कम 15 बड़ी विसंगतियों को रेखांकित किया है. छात्र के अनुसार ब्लैकलिस्टिंग, वित्तीय टर्नओवर की योग्यता और कंपनी की पात्रता से जुड़ी शर्तों को जानबूझकर बदला गया था.
यद्यपि इस संसदीय पैनल के पास सीधे तौर पर कोई दंडात्मक अधिकार नहीं हैं, लेकिन तकनीकी रूप से सरकार इसके सामने पेश साक्ष्यों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती. नियमों के मुताबिक समिति किसी भी वरिष्ठ अधिकारी को समन भेजकर रिकॉर्ड पेश करने के लिए बाध्य कर सकती है. इसमें सहयोग न करना विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है. इसके अलावा मंत्रालय और सीबीएसई को इस पर एक औपचारिक कार्यवाही रिपोर्ट (Action Taken Report) भी देनी होगी.
कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली इस 31-सदस्यीय समिति ने दिसंबर 2025 में ही एक रिपोर्ट सौंपकर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी. समिति ने तब नीट-यूजी पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं के स्थगित होने के बाद व्यवस्था में सुधार की वकालत की थी. हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इन सिफारिशों को विपक्षी दलों की राजनीति बताते हुए खारिज कर दिया था और कहा था कि वे केवल सरकारी विशेषज्ञ समिति की बात मानेंगे.
शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित इसरो के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में ज्यादातर कंप्यूटर-आधारित परीक्षाओं को सुरक्षित माना था. दूसरी तरफ, संसद की स्थायी समिति ने पारंपरिक 'पेन-एंड-पेपर' माध्यम को ज्यादा सुरक्षित और विश्वसनीय बताया था. फिलहाल सरकार इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं ले सकी है कि भविष्य में मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) को पूरी तरह डिजिटल माध्यम में स्थानांतरित किया जाए या पुरानी व्यवस्था ही लागू रखी जाए.