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India Daily

Operation Blue Star: जब अमृतसर की गलियों में गूंजे टैंकों के धमाके, एक फैसले से बदला इतिहास; जानें पूरी सच्चाई

Operation Blue Star: भारत की आज़ादी से पहले सिखों ने एक अलग राष्ट्र का विचार दिया था. अकाली दल ने 1942 में ब्रिटिश सरकार से झेलम से सतलुज तक सिख राज्य की मांग की, जिसे अंग्रेजों ने ठुकरा दिया था. यह मांग क्रिप्स मिशन के सामने रखी गई थी.

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Edited By: Anvi Shukla
Operation Blue Star
Courtesy: social media

Operation Blue Star: आजादी से पहले ही सिखों द्वारा अलग राष्ट्र की मांग की नींव रख दी गई थी. 1942 में क्रिप्स मिशन के भारत दौरे पर अकाली नेताओं ने झेलम से सतलुज तक सिख राज्य की मांग उठाई, जिसे ब्रिटिश सरकार ने ठुकरा दिया.

1971 में पूर्व वित्त मंत्री जगजीत सिंह चौहान ने विदेशों में खालिस्तान का सपना फिर से जीवित किया. लंदन में दूतावास बनाकर, पासपोर्ट और मुद्रा तक छाप दी गई. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे विज्ञापन के पीछे पाकिस्तान की आईएसआई का हाथ बताया गया, जिसमें खालिस्तान को उपमहाद्वीप की शांति की कुंजी बताया गया.

पंजाब पुनर्गठन और नई उम्मीदें

1966 में भाषाई आधार पर पंजाब का पुनर्गठन हुआ, जिससे सिख बहुल राज्य बना. इससे सिखों को एक सांस्कृतिक पहचान मिली और अलग राज्य की मांग थोड़ी शांत हो गई. 1972 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने ज्ञानी जैल सिंह ने सिख भावनाओं को राजनीतिक रूप से भुनाया. ब्रिटेन से लाए गए गुरु गोबिंद सिंह के घोड़े के प्रतीकात्मक वंशज ने सिख वोटबैंक को लुभाया.

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की भूमिका

1973 में सरदार कपूर सिंह की मदद से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव तैयार हुआ, जिसमें पंजाब को अधिक स्वायत्तता देने की मांग की गई. हालांकि, इसका स्वरूप आज भी बहस का विषय है. 1980 में कांग्रेस की जीत के बाद इस प्रस्ताव को दोबारा हवा मिली.

भिंडरावाले की चढ़ाई

दमदमी टकसाल के मुखिया भिंडरावाले ने सिखों की अस्मिता और जनसंख्या घटने का मुद्दा उठाकर आंदोलन को धार दी. खुले तौर पर खालिस्तान का समर्थन न करते हुए भी, उन्होंने कहा, 'हम भारत में नहीं रह सकते.' 1982 में सतलुज-यमुना लिंक नहर के विरोध में अकाली दल और भिंडरावाले ने 'धर्म युद्ध मोर्चा' छेड़ा. भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर परिसर को अपना गढ़ बना लिया, जहां सैकड़ों हथियारबंद अनुयायी और कुछ अपराधी भी एकत्रित हो गए.

ऑपरेशन ब्लूस्टार की शुरुआत

5 जून 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों को हटाने के लिए सेना को भेजा. टैंकों और भारी हथियारों से लैस सेना ने जब धावा बोला, तो अमृतसर की गलियां युद्धभूमि बन गईं. यह मुठभेड़ भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद और दर्दनाक अध्यायों में शामिल हो गई.