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India Daily

Part-2: भगत सिंह से सुभाष बोस तक... अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाले भारतीय

भारत की आजादी की लड़ाई में कई क्रांतिकारियों ने देश और विदेश दोनों जगह ब्रिटिश शासन को चुनौती दी. उनके साहस, रणनीति और बलिदान ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव कमजोर की और स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति दी.

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Part-2: भगत सिंह से सुभाष बोस तक... अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाले भारतीय
Courtesy: AI Generated

भारत की आजादी की लड़ाई केवल भारत की धरती पर नहीं लड़ी गई. यह संघर्ष लंदन की सड़कों, जापान के शहरों, काबुल के राजनीतिक गलियारों और दक्षिण-पूर्व एशिया के युद्धक्षेत्रों तक फैला हुआ था.

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को लगा था कि उन्होंने भारत में विद्रोह की हर संभावना को दबा दिया है. लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में एक नई पीढ़ी सामने आई. इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन को केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में चुनौती दी. ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने इन पर नजर रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नेटवर्क मजबूत किया.

इस श्रृंखला के दूसरे भाग में जानिए उन 12 भारतीयों की कहानी, जिन्होंने अपने साहस, रणनीति और बलिदान से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी.

1. मदन लाल धींगरा: जिसने लंदन में अंग्रेजी सत्ता को झकझोर दिया

1909 में भारतीय छात्र मदन लाल धींगरा ने लंदन में ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी. यह घटना ब्रिटेन की राजधानी में हुई और पूरे साम्राज्य को झटका लगा.

धींगरा ने अदालत में भी अपने फैसले पर पछतावा नहीं जताया और कहा कि वह अपने देश की आजादी के लिए यह कदम उठा रहे हैं.

इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों और क्रांतिकारियों की निगरानी कई गुना बढ़ा दी.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि पहली बार ब्रिटेन की राजधानी में भारतीय क्रांतिकारी ने अंग्रेज अधिकारी को निशाना बनाया था.

2. खुदीराम बोस: कम उम्र, लेकिन अद्भुत साहस

खुदीराम बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे युवा क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं. उन्होंने मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने के उद्देश्य से बम फेंका. हालांकि लक्ष्य बच गया और दो अन्य महिलाओं की मृत्यु हो गई.

1908 में उन्हें फांसी दे दी गई. उस समय उनकी आयु लगभग 18 वर्ष थी.

फांसी के समय उनके चेहरे पर मुस्कान थी. यह दृश्य पूरे बंगाल में युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि इतनी कम उम्र के युवाओं का क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ना ब्रिटिश शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय था.

3. श्री अरविंद: कलम और क्रांति दोनों के योद्धा

आज दुनिया उन्हें आध्यात्मिक चिंतक के रूप में जानती है, लेकिन शुरुआती वर्षों में श्री अरविंद (अरविंद घोष) क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में थे. 1908 के अलीपुर बम केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया. हालांकि बाद में वे बरी हो गए.

उनके लेख और भाषण युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम करते थे.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे शिक्षित युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ रहे थे.

4. रासबिहारी बोस: जिसने विदेश से क्रांति की नई रणनीति बनाई

1912 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले की योजना में रासबिहारी बोस का नाम सामने आया. गिरफ्तारी से बचकर वे जापान पहुंचे और वहीं से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी. उन्होंने बाद में भारतीय स्वतंत्रता लीग को मजबूत किया और आज़ाद हिंद फौज की नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहकर विदेश से आंदोलन संचालित कर रहे थे.

5. बाघा जतिन: गुरिल्ला युद्ध का साहसी चेहरा

जतिंद्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें इतिहास बाघा जतिन के नाम से जानता है, अपनी अद्भुत बहादुरी के लिए प्रसिद्ध थे. 1915 में ओडिशा के बालासोर में उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजी सेना का सामना किया. संसाधन कम होने के बावजूद उन्होंने घंटों तक मुकाबला किया.

ब्रिटिश अधिकारियों ने भी उनकी बहादुरी की सराहना की थी.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे संगठित सशस्त्र क्रांति की तैयारी कर रहे थे.

6. लाला हरदयाल: विदेश से चलाया आजादी का अभियान

लाला हरदयाल गदर आंदोलन के प्रमुख विचारकों में थे. उन्होंने अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीयों को संगठित किया और उन्हें भारत की आजादी के लिए प्रेरित किया.

उनके लेख और भाषणों ने हजारों प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे विदेशों में ब्रिटिश विरोधी जनमत तैयार कर रहे थे.

7. करतार सिंह सराभा: 19 साल का युवा जिसने इतिहास रच दिया

करतार सिंह सराभा गदर आंदोलन के सबसे युवा नेताओं में थे. उन्होंने भारतीय सैनिकों में विद्रोह की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1915 में उन्हें फांसी दे दी गई.

भगत सिंह अपने साथ सराभा का चित्र रखते थे और उन्हें अपना आदर्श मानते थे.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे युवाओं को संगठित कर रहे थे और सेना में विद्रोह फैलाने का प्रयास कर रहे थे.

8. राजा महेंद्र प्रताप: जिसने विदेश में भारत की सरकार बनाई

1 दिसंबर 1915 को राजा महेंद्र प्रताप ने अफगानिस्तान के काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की. यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद सरकार से लगभग 28 वर्ष पहले का प्रयास था.

उन्होंने जर्मनी, तुर्की और अन्य देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे भारत के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जा रहे थे.

9. मौलाना बरकतुल्लाह: कूटनीति से दी चुनौती

मौलाना बरकतुल्लाह काबुल में बनी भारत की अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री बने. उन्होंने विदेशों में भारत की आजादी के पक्ष में जनमत तैयार करने और समर्थन जुटाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा रहे थे.

10. भगत सिंह: जिसने अदालत को भी बना दिया क्रांति का मंच

भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मृत्यु के विरोध में सांडर्स की हत्या की और बाद में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका.

उन्होंने बम फेंकने के बाद भागने की बजाय स्वयं गिरफ्तारी दी ताकि अदालत के माध्यम से अपने विचार पूरे देश तक पहुंचा सकें.

उनका नारा "इंकलाब जिंदाबाद" स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत बन चुके थे.

11. चंद्रशेखर आजाद: जिसने जीते जी गिरफ्तारी स्वीकार नहीं की

चंद्रशेखर आजाद वर्षों तक ब्रिटिश पुलिस को चकमा देते रहे. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मार ली, लेकिन जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आए.

उन्होंने कहा था—"मैं आजाद हूं और आजाद ही रहूंगा."

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि वे लंबे समय तक ब्रिटिश पुलिस की पकड़ से बाहर रहे और क्रांतिकारी संगठन को सक्रिय रखा.

12. सुभाष चंद्र बोस: जिसने अंग्रेजों के खिलाफ सेना खड़ी कर दी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व किया और 1943 में आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की. उनका प्रसिद्ध आह्वान- 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा'- आज भी भारतीय इतिहास के सबसे प्रेरक नारों में गिना जाता है.

आज़ाद हिंद फौज ने पूर्वोत्तर भारत तक सैन्य अभियान चलाया और ब्रिटिश सेना को वास्तविक युद्धक्षेत्र में चुनौती दी.

अंग्रेज क्यों डरते थे?

क्योंकि पहली बार भारतीय नेतृत्व वाली संगठित सेना ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध लड़ रही थी.