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'न राम में रहे न रहीम में,' अखिलेश यादव के PDA ने कैसे दिया BJP को गच्चा? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

अखिलेश यादव ने हर लोकसभा सीट पर जातीय समीकरणों को देखकर ही उम्मीदवारों का चयन किया. बीजपी हिंदुत्व की पिच पर खेल रही थी लेकिन जाति ने खेल बिगाड़ दिया. अखिलेश यादव का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक कार्ड काम कर गया, हिंदुत्व धरा का धरा रह गया. इस सोशल इंजीनियरिंग का फायदा इंडिया गठबंधन को हुआ.

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India Daily Live
Akhilesh Yadav
Courtesy: Social Media

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में इतिहास रचा है. अखिलेश यादव का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) दांव, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हिंदुत्व कार्ड पर भारी पड़ा है. नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नेता बार-बार यह कहते रहे कि इंडिया गठबंधन दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीनकर मुसलमानों को देगी लेकिन उनकी किसी ने सुनी नहीं. अखिलेश का पीडीए फॉर्मूला यूपी में काम कर गया. सपा के 85 फीसदी उम्मीदवार ऐसे हैं, जो पिछड़े, दलित और मुस्लिम समुदाय से आते हैं. 

समाजवादी पार्टी के कुल 37 उम्मीदवार चुनाव जीते हैं. इनमें से 20 ओबीसी हैं, 8 दलित और 4 मुसलमान हैं. अखिलेश यादव ने सवर्णों को कम टिकट दिया था. सपा के सांसदों में सिर्फ एक सांसद ब्राह्मण हैं, वे हैं सनातन पांडेय. वैश्य रुचि वीरा, भूमिहार राजीव राय, ठाकुर आनंद भदौरिया और बीरेंद्र सिंह. 

सपा ने मेरठ और फैजाबाद जैसी सीटों से दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिससे जातीय समीकरण पूरी तरह से सध सके. यादव और मुस्लिम खुलकर सपा के साथ थे. दूसरी पिछड़ी जातियां भी साथ आईं. दलित चेहरा होने की वजह से मायावती से भी उनका मोह भंग हुआ और उन्होंने सपा के साथ जाना चुना. सपा की सहयोगी कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की. जो जीते, उनमें भी पीडीए फॉर्मूला नजर आया. 

राकेश राठौर ओबीसी समाज से हैं. तनुज पूनिया दलित हैं. इमरान मसूद मुसलमान हैं. राहुल गांधी, कश्मीरी पंडित, उज्वल रेवती रमण सिंह भूमिहार हैं और केएल शर्मा पंजाबी हैं. सपा और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवारों की संख्या में 33 ओबीसी, 19 दलित और 6 मुस्लिम थे. 

कहां हुई बीजेपी से चूक?

बीजेपी ने ज्यादातर सीटों पर सवर्ण उम्मीदवार उतारे. ब्राह्मण और ठाकुरों का बोलबाला रहा. राम मंदिर आंदोलन के समय से ही यह समुदाय, बीजेपी के साथ रहा है. मंडल राजनीति के खिलाफ लोगों का गुस्से ने बीजेपी के वोटरों को और कट्टर कर दिया. आंकड़े बाते हैं कि 33 जीते हुए सांसदों में 8 ब्राह्मण, 5 राजपूत और दो वैश्य हैं. 45 फीसदी जीते हुए उम्मीदवार ऊंची जातियों से हैं. 10 ओबीसी और 8 दलित समुदाय के हैं. बीजेपी की सहयोगी पार्टियां राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल (एस) के उम्मीदवारों पर भी नजर डाल लीडजिए. राजकुमार सांगवान जाट हैं और ओबीसी समुदाय से आते हैं. अपना दल की मुखिया अनुप्रिया पटेल कुर्मी हैं और ओबीसी में आती हैं. 

अखिलेश के PDA में ऐसे उलझ गई बीजेपी

जिस हिंदुत्व पर बीजेपी को अटूट भरोसा था, उसी ने उनका खेल बिगाड़ दिया. सपा के पास साल 2019 के चुनाव में महज 5 सांसद थे. बीजेपी के 62 सांसद थे. सपा के 5 सांसदों में 3 मुसलमान थे. आजम खान, शफीकुर्रहमान बर्क और एसटी हसन. दो ओबीसी, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव थे. कोई सवर्ण या दलित सांसद नहीं चुना गया था.  बीजेपी के 62 सांसदों में 12 ब्राह्मण, 11 ठाकुर और 5 वैश्य थे. 45 फीसदी लोग सवर्ण थे. 14 दलित और 20 ओबीसी थे. यह आकंड़ा करीब 55 फीसदी था. बीजेपी की तब सोशल इंजीनियरिंग सफल रही थी.