गुरुग्राम: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम में चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म मामले को लेकर हरियाणा पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेट पर कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने इस मामले में जांच और प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर किया है. यह मामला सोमवार को सुनवाई के दौरान सामने आया, जहां कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर तीखी टिप्पणी की.
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि एक महानगर में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं और पुलिस का रवैया भी बेहद असंवेदनशील है. कोर्ट ने कहा कि एक ट्रॉमा झेल चुकी बच्ची के साथ इस तरह का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पाया कि पुलिस ने बच्ची के माता पिता से पूछा कि वे मामले को कैसे आगे बढ़ाना चाहते हैं. इस पर कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी है और उन्हें कानून की बुनियादी समझ होनी चाहिए.
सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने पीड़ित परिवार की ओर से पेश होते हुए बताया कि जांच अधिकारी परिवार पर एफआईआर वापस लेने का दबाव बना रहे थे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बच्ची का बयान दर्ज करते समय आरोपी पास में मौजूद थे, जो कानून के खिलाफ है.
रोहतगी ने यह भी कहा कि बच्ची को कई दिनों तक पुलिस स्टेशन, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, अदालत और अस्पताल के बीच बार बार ले जाया गया, जिससे उसका मानसिक तनाव और बढ़ गया. परिवार ने घर पर बयान दर्ज करने की मांग की थी लेकिन पुलिस ने इसे नजरअंदाज किया.
कोर्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए गुरुग्राम पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी को पूरे रिकॉर्ड के साथ पेश होने का निर्देश दिया है. इसके अलावा हरियाणा सरकार से यह भी पूछा गया है कि राज्य में कितनी महिला पुलिस अधिकारी हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई या विशेष जांच टीम से कराने की मांग पर नोटिस जारी किया है. साथ ही पुलिस को विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है. अदालत ने मजिस्ट्रेट से भी स्पष्टीकरण मांगा है, जिन्होंने बच्ची का बयान दर्ज किया था. यह मामला अब 25 मार्च को फिर से सुना जाएगा, जहां कोर्ट आगे की कार्रवाई और जांच की दिशा तय करेगा.