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India Daily

थम गई पंडवानी की अमर आवाज... पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन से देशभर में शोक, छोड़ गईं अनमोल विरासत

पद्म विभूषण सम्मानित प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर AIIMS में निधन हो गया. उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला को दुनिया भर में नई पहचान दिलाई.

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Edited By: Reepu Kumari
थम गई पंडवानी की अमर आवाज... पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन से देशभर में शोक, छोड़ गईं अनमोल विरासत
Courtesy: @anshuman_sunona

भारतीय लोक कला जगत से शनिवार को बेहद दुखद खबर सामने आई. छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. उन्होंने रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अंतिम सांस ली. उनके निधन की पुष्टि AIIMS रायपुर के पीआरओ ने की है. तीजन बाई कई सप्ताह से अस्पताल में भर्ती थीं और उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी. उनके जाने से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक का माहौल है.

सीएम विष्णु देव साय ने जताया शोक

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पद्म विभूषण और पद्म श्री सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी कला के दम पर न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश और दुनिया में राज्य का नाम रोशन किया. मुख्यमंत्री ने उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा.

 

 

तड़के 3:15 बजे ली अंतिम सांस

मिली जानकारी के अनुसार, तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से रायपुर AIIMS में इलाज करा रही थीं. शनिवार रात 3:15 बजे उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई. डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और उन्होंने अस्पताल में अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर सामने आते ही लोक कला से जुड़े कलाकारों और उनके प्रशंसकों में गहरा दुख फैल गया.

छत्तीसगढ़ की लोक कला को दिलाई वैश्विक पहचान

तीजन बाई ने अपने जीवन का अधिकांश समय पंडवानी गायन को समर्पित किया. उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस पारंपरिक लोक कला को देश की सीमाओं से बाहर एशिया और यूरोप समेत दुनिया के कई मंचों तक पहुंचाया. उनकी दमदार प्रस्तुति, प्रभावशाली आवाज और अनूठी शैली ने पंडवानी को नई पहचान दिलाई.

रूढ़ियों को तोड़कर बनाई अलग पहचान

दुर्ग जिले के गनियारी गांव में वर्ष 1956 में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष से भरा रहा. उन्होंने उस दौर में पंडवानी की 'कापालिक शैली' को अपनाया, जब इस शैली में पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था. शुरुआत में उन्हें सामाजिक विरोध और कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.

हाथ में तंबूरा लेकर जब तीजन बाई मंच पर उतरती थीं, तो उनकी आवाज, अभिनय और भाव भंगिमाएं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं. यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई.

पांच दशक तक कला की सेवा

पांच दशकों से अधिक लंबे अपने कलात्मक सफर में तीजन बाई ने न केवल पंडवानी परंपरा को जीवित रखा, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रेरित किया. सामाजिक बाधाओं के बावजूद उन्होंने इस लोक कला को लोकप्रिय बनाया और इसे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित

लोक संस्कृति और पंडवानी गायन में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें देश के कई प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से नवाजा गया. उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मान प्राप्त हुए. ये सम्मान भारतीय लोक कला को समर्पित उनके लंबे और प्रेरणादायी सफर की पहचान हैं.

लोक कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति

तीजन बाई का निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है. उन्होंने अपने संघर्ष, समर्पण और कला के दम पर पंडवानी को वैश्विक मंच तक पहुंचाया. उनकी आवाज भले अब खामोश हो गई हो, लेकिन लोक कला के प्रति उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा.