बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और बढ़ती हिंसा पर निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने खुलकर अपनी बात रखी है. उन्होंने कहा है कि बांग्लादेश में जिहाद के दो अलग-अलग चेहरे दिखाए जा रहे हैं, लेकिन दोनों की सोच और दिशा एक ही है. उनके अनुसार, रूप भले ही अलग हों, लेकिन मकसद भारत के खिलाफ नफरत और टकराव को बढ़ाना बताया जा रहा है.
तसलीमा नसरीन ने कहा कि जिहाद का एक चेहरा वह है, जो दाढ़ी-टोपी में, मदरसों से जुड़ा हुआ नजर आता है. दूसरा चेहरा पश्चिमी कपड़ों में, विश्वविद्यालयों की डिग्री लेकर सामने आता है. देखने में ये दोनों वर्ग अलग लगते हैं, लेकिन उनकी सोच और लक्ष्य समान बताए जाते हैं. उनके मुताबिक, दोनों ही भारत को दुश्मन मानते हैं और युद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ने की बात करते हैं.
अपने बयान में तसलीमा नसरीन ने यह भी कहा कि इन दोनों वर्गों का साझा सपना भारत के खिलाफ खड़ा होना और पाकिस्तान के साथ कदम से कदम मिलाना बताया जाता है. उन्होंने इसे बांग्लादेश के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत बताया और कहा कि ऐसी सोच से देश में शांति और स्थिरता कमजोर होती है.
हालांकि तसलीमा नसरीन ने यह साफ किया कि बांग्लादेश की पूरी आबादी कट्टरपंथी नहीं है. उन्होंने कहा कि आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग स्वतंत्र सोच, प्रगतिशील विचार और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं. यही वजह है कि बांग्लादेश के पास अब भी मौका है कि वह खुद को एक आधुनिक, सभ्य और गैर-सांप्रदायिक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ाए.
तसलीमा नसरीन ने चेतावनी दी कि अगर भारत और बांग्लादेश के बीच सांस्कृतिक रिश्ते टूटते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा कट्टरपंथी ताकतों को मिलेगा. सांस्कृतिक संपर्क खत्म होने से नफरत और हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे जिहादी सोच और मजबूत होगी.
उन्होंने कहा कि नफरत का जवाब नफरत से नहीं दिया जाना चाहिए. हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. शांति, संवाद और सांस्कृतिक निरंतरता ही दोनों देशों के लिए बेहतर रास्ता है.
तसलीमा नसरीन ने अपील की कि खेल, कला और संस्कृति को राजनीति से दूर रखा जाए. क्रिकेट चलता रहे, रंगमंच, सिनेमा, संगीत और पुस्तक मेले जारी रहें. उन्होंने कहा कि इन पर रोक लगाने से सबसे बड़ा नुकसान बांग्लादेश को ही होगा, जबकि संवाद और सह-अस्तित्व से एक शांतिपूर्ण और समावेशी भविष्य संभव है.