नई दिल्ली: क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है. 1945 में अमेरिका ने जो जापान के साथ किया था क्या अब इजरायल भी ईरान के साथ वही करेगा.इस तरह के कई सवाल लोग दुनियाभर में पूछ रहे हैं. मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर चल रही सैन्य कार्रवाई के बीच तनाव चरम पर है. ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान दिया है, जिसमें उन्होंने इजरायल द्वारा परमाणु हमले की किसी भी अटकल को सिरे से नकार दिया.
ट्रंप का कहना है कि इजरायल ऐसा कभी नहीं करेगा. यह टिप्पणी तब आई जब उनके ही सलाहकार ने युद्ध लंबा खिंचने पर परमाणु खतरे की आशंका जताई थी. ट्रंप ने दोनों देशों के बीच गहरे समन्वय का हवाला देते हुए स्थिति को नियंत्रित बताया.
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, 'इजरायल ऐसा नहीं करेगा... इजरायल कभी ऐसा नहीं करेगा.' उन्होंने डेविड सैक्स के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि सैक्स ने उन्हें ऐसी कोई आशंका नहीं बताई. सैक्स ने एक पॉडकास्ट में कहा था कि अगर युद्ध लंबा चला तो इजरायल परमाणु विकल्प पर विचार कर सकता है, लेकिन ट्रंप ने इसे बेबुनियाद करार दिया. दोनों देशों की सेनाओं के बीच मजबूत तालमेल को उन्होंने इसकी वजह बताया.
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के लक्ष्य भले ही पूरी तरह एक जैसे न हों, लेकिन दोनों पक्ष काफी हद तक एकमत हैं. उन्होंने ईरान के खिलाफ चल रही कार्रवाई को सही ठहराया और कहा कि मजबूत समन्वय से स्थिति नियंत्रण में है. ट्रंप का मानना है कि यह सहयोग किसी भी बड़े खतरे को टाल सकता है. उन्होंने दोहराया कि इजरायल परमाणु हथियार का रास्ता नहीं अपनाएगा, क्योंकि दोनों देश मिलकर ईरान की चुनौती से निपट रहे हैं.
ट्रंप ने सोमवार को खुलासा किया कि एक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने निजी बातचीत में उनसे कहा, 'काश मैंने अपने समय में ईरान के खिलाफ कार्रवाई की होती.' हालांकि ट्रंप ने उसका नाम नहीं बताया और कहा कि वे उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहते. चार पूर्व राष्ट्रपति जीवित हैं, लेकिन ट्रंप ने इसे व्यक्तिगत रखा. यह बयान ईरान के खिलाफ निर्णायक कदम की जरूरत पर उनके रुख को मजबूत करता है.
ट्रंप ने बार-बार कहा कि ईरान पिछले पचास साल से अमेरिका के लिए समस्या बना हुआ है. उन्होंने अपनी नीति को सही ठहराते हुए कहा कि निर्णायक कार्रवाई जरूरी थी. रिपब्लिकन पार्टी के कुछ 'अमेरिका फर्स्ट' समर्थकों में असंतोष है, लेकिन ट्रंप पेट्रोल कीमतों के दबाव के बावजूद अडिग हैं. उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार न देने की प्रतिबद्धता दोहराई.
उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने ट्रंप के रुख का पूरा साथ दिया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के नेतृत्व में की गई सैन्य कार्रवाई सही है. वैंस ने सभी अमेरिकियों से सैनिकों की सफलता और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने की अपील की. उन्होंने जोर दिया कि डेमोक्रेट-रिपब्लिकन सबको ईरान को परमाणु हथियार से रोकना चाहिए. यह बयान प्रशासन की एकजुटता दिखाता है.
1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने 'लिटिल बॉय' और 'फैट मैन' नामक परमाणु बम क्रमशः हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए, जिन्होंने भयानक विनाश मचाया और लाखों लोगों को तत्काल मौत के साथ-साथ लंबे समय तक रेडिएशन के घातक दुष्प्रभावों से जूझना पड़ा. हिरोशिमा पर हुए इस हमले ने न सिर्फ द्वितीय विश्व युद्ध को तेजी से समाप्त करने में भूमिका निभाई, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया. जापान ने 2 सितंबर 1945 को आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे युद्ध का अंत हुआ, लेकिन साथ ही परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो गई. 1949 में सोवियत संघ के पहले परमाणु परीक्षण ने शीत युद्ध की नींव मजबूत की, जहां अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हथियारों की स्पर्धा ने दुनिया को परमाणु विनाश के खतरे में डाल दिया, और यह भय आज भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.