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Nestle Milk Row: बच्चों को पोषण नहीं, बीमारी दे रहे हैं आप, यकीन नहीं है? पढ़ें ये रिपोर्ट

नेस्ले के मिल्क ब्रांड को कौन नहीं जानता. भारत और दूसरे पिछड़े देशों के दूध में ये कंपनी शुगर मिलाकर देती है. भारत में सेरलैक बेबी ग्रेन में 3 ग्राम अतिरिक्त चीनी होती है. WHO बार-बार आगाह करता रहा है कि इसकी वजह से शिशुओं में दीर्घकालिक समस्याएं हो सकती हैं. आइए जानते हैं क्या है यह ताजा विवाद.

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Nestle Milk Row: बच्चों को पोषण नहीं, बीमारी दे रहे हैं आप, यकीन नहीं है? पढ़ें ये रिपोर्ट
Courtesy: Social Media

जिन देशों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता कम हो, वहां कंपनियां फूड प्रोडक्ट्स को लेकर भी भेदभाव करती हैं. अगर आप बच्चों को पोषण के नाम पर हेल्थ ड्रिंक और पाउडर मिल्क पिला रहे हैं तो अलर्ट हो जाएं. ये खबर आपके काम की है. नेस्ले कंपनी गरीब और पिछड़े देशों में जो दूध बेचती है, उसमें शुगर की मात्रा ज्यादा होती है. स्विस इन्वेस्टिगेटिंग ऑर्गेनाइजेशन पब्लिक आई और इंटरनेसनल बेबी फूड एक्शन नेटवर्क (IBFAN) ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बेचे जाने वाले ड्रिंक का टेस्ट जब बेल्जियम की प्रयोगशाला में किया तो चौंकाने वाले नतीजे आए.

भारत में साल 2022 में ऐसे प्रोडक्ट्स से बिक्री 2000 करोड़ से ज्यादा हुई है. अगर आप अपने बच्चों को हेल्थ ड्रिंक दे रहे हैं, तो सावधान हो जाएं. जिस सैरेलेक बेबी ग्रेन को आप पोषण का खजाना मानते हैं, उसमें औसतन 3 ग्राम अतिरिक्त चीनी होती है. बुधवार को सार्वजनिक की गई पब्लिक आई की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जर्मनी, फ्रांस और यूके में नेस्ले द्वारा बेचे जाने वाले छह महीने के बच्चों के लिए सेरेलैक पाउडर में कोई अतिरिक्त चीनी नहीं थी, जबकि थाईलैंड और इथोपिया जैसे देशों में यह मात्रा 6 ग्राम से ज्यादा थी.

क्यों WHO ने जताई है चिंता?
WHO साइंटिस्ट निगेल रोलिंस ने पब्लिक I और IBFAN की रिपोर्ट पर कहा, 'यह डबल स्टैंडर्ड है, जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता है. नेस्ले स्विट्जरलैंड में इन उत्पादों में चीनी नहीं मिलाती लेकिन गरीब देशों में ऐसा हो रहा है. यह सार्वजनिक स्वास्त्य और नैतिक नजरिए दोनों से ठीक नहीं है.'

बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है बुरा असर
WHO ने कहा कहै कि अगर बचपन से ही ऐसे उत्पाद बच्चों को दिए जाते हैं तो इसका दीर्घकालिक असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ सकता है. ऐसे उत्पादों की वजह से मोटापा और दूसरी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. साल 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनियाभर के देशों से बच्चों के प्रोडक्ट्स में ऐडेड शुगर के इस्तेमाल पर रोक लगाने की अपील की थी.