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India Daily

जब भारतीय महिलाओं ने देश के लिए उतार दिए थे अपने गहने, 'नेताजी' को मिले अपार जनसमर्थन की अनसुनी कहानी

1943 से 1945 के बीच दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली हजारों भारतीय महिलाओं ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर अपने गहने और बचत आज़ाद हिंद फ़ौज को दान कर दी. यह त्याग स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक अध्याय बना.

KanhaiyaaZee
जब भारतीय महिलाओं ने देश के लिए उतार दिए थे अपने गहने, 'नेताजी' को मिले अपार जनसमर्थन की अनसुनी कहानी
Courtesy: AI Generated

भारत की आज़ादी की लड़ाई केवल रणभूमि में नहीं लड़ी गई थी. इस संघर्ष में लाखों ऐसे लोगों ने भी योगदान दिया, जिन्होंने बंदूक नहीं उठाई, लेकिन अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया. ऐसी ही एक प्रेरक कहानी उन हजारों भारतीय महिलाओं की है, जिन्होंने वर्ष 1943 से 1945 के बीच दक्षिण-पूर्व एशिया में आज़ाद हिंद फ़ौज (आईएनए) के समर्थन में अपने गहने, सोना और वर्षों की जमा पूंजी दान कर दी.

यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन कम चर्चित अध्यायों में से एक है, जो बताती है कि देशभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण से भी साबित होती है.

नेताजी के आह्वान ने बदल दिया माहौल

साल 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाली और आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की, तब उन्होंने वहां रहने वाले भारतीय समुदाय से स्वतंत्रता संग्राम में हर संभव सहयोग देने की अपील की.

नेताजी का संदेश साफ था कि भारत की आज़ादी केवल सैनिकों के बल पर नहीं मिलेगी, बल्कि हर भारतीय को अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देना होगा. उनके इस आह्वान का सबसे गहरा असर महिलाओं पर पड़ा.

सभाओं में महिलाओं ने उतार दिए अपने गहने

नेताजी की सभाओं में एक के बाद एक महिलाएं मंच तक पहुंचतीं और अपने हाथों की चूड़ियां, गले के हार, कानों के झुमके, अंगूठियां और अन्य सोने के आभूषण दान पात्र में डाल देतीं.

कई महिलाओं ने नकद धनराशि भी सौंपी, जबकि कुछ ने अपनी वर्षों की बचत देश के नाम कर दी. उस दौर में गहने केवल आभूषण नहीं होते थे, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार माने जाते थे. इसके बावजूद महिलाओं ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनका त्याग कर दिया.

केवल संपन्न परिवार नहीं, आम महिलाएं भी बनीं सहभागी

इस अभियान में केवल धनी परिवारों की महिलाएं ही शामिल नहीं थीं. रबर बागानों में काम करने वाले मजदूर परिवारों, छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और सामान्य परिवारों की महिलाओं ने भी अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया.

कई युवतियों ने केवल गहने ही नहीं दिए, बल्कि आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला इकाई 'रानी झांसी रेजिमेंट' में शामिल होकर प्रशिक्षण भी लिया. इससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं की भागीदारी आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं थी.

इन दानों से मिली आर्थिक मजबूती

इतिहासकारों के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय समुदाय से मिले दान ने आज़ाद हिंद फ़ौज और आज़ाद हिंद सरकार को आर्थिक आधार प्रदान किया.

इन चंदों का उपयोग सैनिकों के लिए आवश्यक सामग्री, संगठन चलाने, प्रशासनिक कार्यों, राहत व्यवस्था और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करने में किया गया. इसी व्यापक आर्थिक सहयोग के कारण रंगून में 'आज़ाद हिंद बैंक' की स्थापना भी की गई, ताकि प्राप्त दान का व्यवस्थित संचालन किया जा सके.

महिलाओं के त्याग की कई यादगार घटनाएं

ऐतिहासिक अभिलेखों में कई ऐसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने अपने सभी गहने दान कर दिए. कुछ ने नेताजी के सामने ही अपने आभूषण उतार दिए, जबकि कुछ ने बाद में भी आर्थिक सहायता भेजी.

बाद में सार्वजनिक हुए अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि नेताजी के पास जो बहुमूल्य आभूषण और सोना था, उसका बड़ा हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों, विशेषकर महिलाओं द्वारा दिए गए दान से आया था.

रानी झांसी रेजिमेंट ने जगाया नया आत्मविश्वास

महिलाओं के उत्साह को बढ़ाने में रानी झांसी रेजिमेंट की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. इस महिला रेजिमेंट का नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया. इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली भारतीय मूल की अनेक युवतियों ने हिस्सा लिया.

इस रेजिमेंट ने यह संदेश दिया कि महिलाएं केवल सहयोगी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की सक्रिय सहभागी भी बन सकती हैं.

इतिहास में कम चर्चा, लेकिन योगदान अमूल्य

स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा की कहानियों में इस घटना का उल्लेख अपेक्षाकृत कम मिलता है, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदाय का आर्थिक और सामाजिक सहयोग आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था.

महिलाओं के इस त्याग ने यह साबित किया कि देश की आज़ादी केवल रणभूमि में लड़ने वालों की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी देन है जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपना सबसे कीमती धन राष्ट्र के नाम कर दिया.

आज भी प्रेरणा देती है यह कहानी

आज, जब स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को नए नजरिए से देखा जा रहा है, तब इन महिलाओं का योगदान हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े नेताओं का काम नहीं होता. समाज का हर वर्ग अपनी भूमिका निभाता है.

हजारों भारतीय महिलाओं द्वारा अपने गहने और बचत दान करना केवल आर्थिक सहयोग नहीं था, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि एक दिन भारत जरूर आज़ाद होगा. उनका यह त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, साहस और समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण बना रहेगा.