अंग्रेजी शासन केवल फांसी देकर ही क्रांतिकारियों को नहीं रोकता था. कई मामलों में ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य यह होता था कि क्रांतिकारी जिंदा रहें, लेकिन वर्षों तक जेल की यातनाएं झेलते रहें ताकि उनका मनोबल टूट जाए और दूसरे लोग भी विद्रोह करने से डरें.
इसी सोच के तहत अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को 'Transportation for Life' यानी आजीवन निर्वासन या काला पानी की सजा दी गई. उन्हें हजारों किलोमीटर दूर अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा जाता था, जहां कैदियों को कठोर श्रम, कोड़े, बेड़ियां, एकांत कारावास और बेहद खराब भोजन जैसी यातनाएं सहनी पड़ती थीं.
सबसे चर्चित मामलों में एक नाम विनायक दामोदर सावरकर का है. 1911 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो अलग-अलग मामलों में दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई. यानी कुल 50 वर्ष के कारावास का आदेश. उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया, जहां उन्होंने वर्षों तक कठोर श्रम किया.
जेल में कैदियों से नारियल का तेल निकालने के लिए कोल्हू चलवाया जाता था, बेड़ियों में रखा जाता था और लंबे समय तक एकांत कोठरी में बंद किया जाता था. बाद में उन्हें मुख्य भूमि की जेलों में स्थानांतरित किया गया. उनकी सजा और जेल जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे चर्चित कारावासों में गिने जाते हैं.
बारीन्द्र कुमार घोष, जो प्रसिद्ध दार्शनिक श्री अरविंद के छोटे भाई थे, अलीपुर बम मामले में गिरफ्तार हुए. शुरुआत में उन्हें मृत्युदंड दिया गया था, लेकिन बाद में सजा बदलकर आजीवन कारावास कर दी गई. उन्हें भी अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया. करीब एक दशक तक जेल में रहने के बाद 1920 में आम माफी के दौरान उन्हें रिहा किया गया. जेल से निकलने के बाद उन्होंने पत्रकारिता और लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को आगे बढ़ाया.
उल्लासकर दत्त भी अलीपुर बम केस के प्रमुख अभियुक्तों में थे. उन्हें पहले फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया. सेल्युलर जेल में लगातार अत्याचार और कठोर श्रम के कारण उनका मानसिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ. वर्षों बाद उनकी रिहाई हुई, लेकिन जेल में बिताया गया समय उनके जीवन पर गहरा असर छोड़ गया.
भाई परमानंद को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया. उन्हें पहले मृत्युदंड सुनाया गया, लेकिन बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया. उन्हें भी अंडमान भेजा गया, जहां उन्होंने कई वर्षों तक जेल जीवन बिताया. बाद में उनकी रिहाई हुई और उन्होंने शिक्षा तथा सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सचिंद्रनाथ सान्याल हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के प्रमुख नेताओं में थे और भगत सिंह सहित अनेक युवा क्रांतिकारियों पर उनका गहरा प्रभाव था. काकोरी कांड के बाद उन्हें आजीवन कारावास मिला और अंडमान भेजा गया. रिहाई के बाद भी वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सक्रिय रहे, जिसके कारण उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया. लगातार जेल और कठिन परिस्थितियों ने उनके स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया. बाद में क्षय रोग (टीबी) से उनका निधन हुआ.
त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं. उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और लंबे समय तक जेल तथा नजरबंदी झेलनी पड़ी. इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश कारावास और प्रतिबंधों के बीच बिताया. आज उनका नाम आम लोगों के बीच बहुत कम सुनाई देता है, जबकि स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान महत्वपूर्ण था.
सेल्युलर जेल को केवल जेल नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक यातना का केंद्र माना जाता था. यहां कैदियों को घंटों तक कोल्हू चलाना पड़ता था, हाथ-पैरों में भारी बेड़ियां पहनाई जाती थीं, छोटी-सी एकांत कोठरी में रखा जाता था, नियम तोड़ने पर कोड़े लगाए जाते थे और परिवार से मिलने और पत्र लिखने पर कड़े प्रतिबंध होते थे. इन परिस्थितियों में अनेक कैदी बीमार पड़ गए और कई कभी सामान्य जीवन में लौट ही नहीं सके.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल शहादत की नहीं, बल्कि लंबे धैर्य और असाधारण सहनशक्ति की भी है. जिन क्रांतिकारियों को फांसी नहीं हुई, उन्होंने भी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष जेल की कालकोठरियों में बिताए.
उनका संघर्ष इस बात की याद दिलाता है कि आजादी केवल कुछ मशहूर नामों की देन नहीं थी, बल्कि हजारों ऐसे लोगों के त्याग का परिणाम थी जिनके नाम इतिहास की मुख्यधारा में कम दर्ज हुए, लेकिन जिनकी कुर्बानी किसी भी मायने में कम नहीं थी.