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The Vvaan Review: देवी, छठ पूजा और रहस्यमयी जंगल की कहानी, लेकिन आखिर कहां फीकी पड़ गई फिल्म

सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फैंटेसी थ्रिलर The Vvaan एक दिलचस्प आइडिया के साथ शुरू होती है. देवी, छठ पूजा, पवित्र जंगल और सुपरनैचुरल घटनाओं को जोड़ने वाली फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखता है.

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Edited By: Babli Rautela
The Vvaan Review: देवी, छठ पूजा और रहस्यमयी जंगल की कहानी, लेकिन आखिर कहां फीकी पड़ गई फिल्म
Courtesy: Social Media

सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म The Vvaan एक ऐसे आइडिया के साथ आती है, जिसमें भारतीय संस्कृति, छठ पूजा, देवी और सुपरनैचुरल घटनाओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है. फिल्म का कॉन्सेप्ट शुरुआत में दिलचस्प लगता है और कहानी का पहला हिस्सा दर्शकों के मन में कई सवाल खड़े करता है. लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, खासकर दूसरे हाफ में, कहानी अपनी दिशा खोती हुई नजर आती है. दीपक कुमार मिश्रा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, अनूप सोनी, सुनील ग्रोवर, श्वेता तिवारी और मनीष पॉल अहम भूमिकाओं में हैं.

  • रेटिंग: 2.5/5

क्या है The Vvaan की कहानी?

फिल्म की कहानी ऋषि के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार सिद्धार्थ मल्होत्रा ने निभाया है. ऋषि अपनी पत्नी ममता के साथ मुंबई में रहता है. दोनों लंबे समय से माता-पिता बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती. इसी बीच ऋषि के परिवार की ओर से उस पर अपने गांव लौटने और छठ पूजा में शामिल होने का दबाव रहता है. ऋषि लगातार इससे बचता रहता है, लेकिन आर्थिक परेशानियों के चलते आखिरकार उसे अपने गांव वापस जाना पड़ता है.

ऋषि के साथ उसकी पत्नी ममता और दोस्त वेद भी गांव पहुंचते हैं. यहां ऋषि अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचने की कोशिश करता है. इस जमीन से होकर एक सड़क बनाए जाने की योजना है. लेकिन जिस इलाके में यह जमीन है, वह ग्रामीणों के लिए पवित्र माना जाता है और वे वहां किसी तरह के निर्माण का विरोध करते हैं. यहीं से कहानी में सुपरनैचुरल घटनाओं की शुरुआत होती है.

पहला हाफ क्यों करता है प्रभावित?

The Vvaan का पहला हिस्सा फिल्म का मजबूत पक्ष है. फिल्म मुंबई की शहरी जिंदगी से गांव के माहौल में काफी सहज तरीके से पहुंचती है. इसके साथ ही ऋषि के अतीत की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं. रहस्यमयी जंगल और वहां से जुड़ी मान्यताएं कहानी में उत्सुकता पैदा करती हैं. खास तौर पर रात में उस जंगल में जाने पर रोक और वहां होने वाली रहस्यमयी घटनाएं दर्शकों के मन में कई सवाल खड़े करती हैं. यही वजह है कि इंटरवल तक फिल्म यह उम्मीद बनाए रखती है कि आगे कहानी किसी दिलचस्प और प्रभावी मोड़ पर पहुंच सकती है.

दूसरे हाफ में कमजोर पड़ जाती है फिल्म

समस्या फिल्म के दूसरे हिस्से में शुरू होती है. कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय कई ट्रैक एक साथ चलने लगते हैं, जिससे नैरेटिव बिखरा हुआ महसूस होता है. एडिटिंग भी इस हिस्से में फिल्म की परेशानी बढ़ाती है. कई सीन्स के बीच फ्लो कमजोर नजर आता है. मनीष पॉल का किरदार कॉमेडी के लिए इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उनकी कॉमेडी कई जगह जरूरत से ज्यादा खिंच जाती है.

खासकर एक बुजुर्ग महिला को चुड़ैल समझने वाला ट्रैक बार-बार वापस आता है. जब कहानी में तनाव पैदा करने की कोशिश होती है, उस दौरान भी यह कॉमेडी बीच में आती रहती है. इससे फिल्म का माहौल कई बार टूट जाता है. हालांकि मनीष पॉल की कॉमिक टाइमिंग कुछ दृश्यों को संभाल लेती है और उन्हें फिल्म की कुछ मजेदार वन लाइनर्स भी मिले हैं.

क्लाइमेक्स में बढ़ती है उलझन

फिल्म का क्लाइमेक्स काफी शोर और घटनाओं से भरा हुआ है, लेकिन इसका असर उतना मजबूत नहीं बन पाता. इस मोड़ तक आते-आते फिल्म अपने मुख्य रहस्य को सुलझाने के बजाय कई नई जानकारियां और बैकस्टोरी सामने लाती है. नतीजा यह होता है कि जिन सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद होती है, उनमें से कुछ के साथ नए सवाल भी खड़े हो जाते हैं.

फिल्म में गानों की संख्या भी कहानी की रफ्तार को प्रभावित करती है. कई जगह ऐसा महसूस होता है कि गाने कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय बीच में रुकावट पैदा कर रहे हैं. विजुअल इफेक्ट्स भी बहुत प्रभावशाली नहीं हैं और फिल्म के सुपरनैचुरल हिस्से को उस स्तर की भव्यता नहीं दे पाते जिसकी इस तरह की कहानी से उम्मीद की जा सकती है.

कैसी है सिद्धार्थ और तमन्ना की एक्टिंग?

सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने किरदार में ठीक नजर आते हैं, लेकिन उनका रोल काफी जाना-पहचाना महसूस होता है. एक शहरी व्यक्ति के रूप में उनकी भूमिका में ऐसा बहुत कुछ नया नहीं दिखता जो उनके पिछले काम से अलग पहचान बना सके.

वहीं तमन्ना भाटिया फिल्म में भावनात्मक स्तर पर ज्यादा प्रभाव डालती हैं. खासकर मां बनने की उनकी इच्छा और उससे जुड़ी भावनाओं को उन्होंने सहज तरीके से निभाया है. अनूप सोनी और श्वेता तिवारी भी अपने किरदारों में अच्छी तरह फिट बैठते हैं. वहीं सुनील ग्रोवर को नेगेटिव रोल में देखना फिल्म के दिलचस्प पहलुओं में शामिल है. उनका चयन इस भूमिका के लिए अलग तरह का प्रभाव पैदा करता है.