Kanyadaan Beliefs : हिंदू धर्म में विवाह संस्कार को काफी अहम माना गया है. इस संस्कार में सबसे ज्यादा महत्व कन्यादान को दिया गया है. कन्यादान में एक पिता अपनी पुत्री का हाथ उसके पति के हाथों में देता है. इसके साथ ही वह अपने घर की सुख और समृद्धि को भी अपने दामाद को दान कर देता है.
अज्ञानतावश काफी लोग कन्यादान का अर्थ पुत्री का दान समझते हैं. जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. कन्यादान का मतलब पुत्री का दान नहीं होता है. शास्त्रों के जानकार कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में कभी भी किसी स्त्री का दान नहीं दिया जाता है. कन्यादान शब्द के अर्थ का सही मतलब न जानने के कारण लोगों ने इसको स्त्री का दान समझ लिया है.
विवाह संस्कार में पिता अपनी पुत्री का कन्यादान करता है. इसका मतलब यह नहीं होता है कि वह अपनी पुत्री को किसी व्यक्ति को दान दे रहा है और न ही वह अपनी संपत्ति का दान देता है. इसका मतलब होता है गोत्र का दान करना. लड़की अपने पिता का गोत्र छोड़कर पति के के गोत्र में प्रवेश करती है.
गोत्र किसी परिवार के वंश का सूचक होता है. किसी व्यक्ति के पूर्वज जिस वंश के होते हैं वही उसका गोत्र कहलाता है. इसकी कारण समान गोत्र में शादियां नहीं होती हैं, क्योंकि समान गोत्र के लोग एक ही वंश के होते हैं.
जब विवाह संस्कार किया जाता है तो कन्या अपने पिता का गोत्र छोड़कर अपने पति के गोत्र में प्रवेश करती है. इसका अर्थ यह है कि अब वह कन्या उस वंश की हो जाती है, जिस वंश में वह विवाह करती है. कन्या की संतान भी उसी वंश की संतान होती हैं. जब विवाह होता है तो पिता कन्या को अपने गोत्र से विदा करता है और वह अपना गोत्र अग्निदेव को दान कर देता है. वहीं, वर भी अग्निदेव को साक्षी मानकर कन्या को अपना गोत्र प्रदान करता है. वर जब कन्या को अपने गोत्र में स्वीकार कर लेता है तो इसको कन्यादान कहते हैं. इसी कारण इसको महादान कहते हैं, क्योंकि अब वह कन्या अपने पिता के वंश की नहीं अपने पति के वंश की हो जाती है.
समाज में अभी कन्यादान को लेकर काफी भ्रांतियां फैली हुई हैं. लोग समझते हैं कि कन्यादान का अर्थ किसी स्त्री को दान करना है, जो कि सरासर गलत है.
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