कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर चल रही सियासी हलचल के बीच एक अहम कानूनी फैसला सामने आया है, जिसने इस पूरे मुद्दे को नई दिशा दे दी है. लाखों नाम हटाए जाने के बाद शुरू हुई अपील प्रक्रिया में एक ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड को पहचान के रूप में स्वीकार करते हुए एक उम्मीदवार के पक्ष में फैसला सुनाया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस तेज हो गई है.
यह मामला फरक्का सीट से जुड़े कांग्रेस उम्मीदवार मोताब का था, जिनका नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था. न्यायाधिकरण ने पाया कि चुनाव आयोग उनके नाम हटाने का ठोस कारण पेश नहीं कर सका. इस पर सुनवाई करते हुए सेवानिवृत्त न्यायाधीश टी.एस. शिवगणनम ने स्पष्ट किया कि बिना उचित कारण के किसी मतदाता को सूची से बाहर करना उचित नहीं ठहराया जा सकता.
अधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि भले ही आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसे पहचान के लिए सहायक दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद चुनाव आयोग ने भी आधार को एक सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर मान्यता दी थी। इसी आधार पर 'मोताब शेख' नाम को सही मानते हुए अधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया.
सुनवाई के दौरान उम्मीदवार ने पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र जैसे कई डॉक्यूमेंट पेश किए. इन सभी डॉक्यूमेंट में उनका नाम समान ही था. इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने पहले हुई नाम में गलती को सही करने के लिए दायर हलफनामें को भी पेश किया. इस दौरान ये भी सामने आया कि उनके परिवार के अन्य सभी सदस्यों के नाम सूची में शामिल थे, केवल उनका नाम ही हटाया गया था.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई हो चुकी है. जिसमें सुप्रीत कोर्ट ने की दिशा निर्देश दिए थे. कोर्ट ने उस निर्देश को रेखांकित किया, जिसमें कहा गया था कि हर नाम जोड़ने या हटाने के पीछे स्पष्ट कारण दर्ज करना अनिवार्य है.
अदालत ने यह भी कहा था कि इस प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी रखने के लिए ये आवश्यकर है. गौरतलब है कि एसआईआर के तहत राज्य में करीब 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, हालांकि अंतिम सूची अभी जारी नहीं हुई है.