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क्या होती है जीपीएस जैमिंग तकनीक, आखिर कैसे ईरान-इजराइल-USA युद्ध में बना सबसे बड़ा हथियार?

ईरान-इजराइल-US के बीच चल रहे युद्ध के बीच जीपीएस जैमिंग तकनीक काफी चर्चा में है. अगर आप इस बारे में जानना चाहते हैं, तो यहां हम आपको इसके बारे में सारी डिटेल्स दे रहे हैं.

Shilpa Shrivastava
क्या होती है जीपीएस जैमिंग तकनीक, आखिर कैसे ईरान-इजराइल-USA युद्ध में बना सबसे बड़ा हथियार?
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच युद्ध काफी तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच चुका है. इस युद्ध के बीच एक नया इलेक्ट्रॉनिक हथियार सबसे ज्यादा चर्चा में है, जिसका नाम है जीपीएस जैमिंग. इसके बारे में बताएं तो इस टेक्नोलॉजी के जरिए सैटेलाइट से आने वाले लोकेशन सिग्नल को भटका दिया जाता है. इससे ड्रोन, मिसाइल, जहाज और विमान सही डायरेक्शन नहीं पा पाते हैं.

कई लोगों के सवाल हैं कि आखिरी जीपीएस जैमिंग होता क्या है और कैसे काम करता है. इसके साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि युद्ध में जीपीएम जैमिंग का इस्तेमाल आखिर किया कैसे जाता है और क्या आम जनता पर इसका कोई असर पड़ता है या नहीं.

क्या होता है GPS जैमिंग:

GPS सिग्नल बहुत कमजोर होते हैं जो सैटेलाइट से पृथ्वी तक आते हैं. जैमर एक ऐसी डिवाइस होती है, जो इन सिग्नल्स से ज्यादा मजबूत रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजती है, जिससे असली जीपीएस सिग्नल कम हो जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि मोबाइल, ड्रोन या मिसाइल को सही तरह से लोकेशन की जानकारी नहीं मिल पाती है और वो गलत डायरेक्शन में चले जाते हैं. सिर्फ जैमिंग ही नहीं बल्कि स्पूफिंग का भी इस्तेमाल किया जाता है. इसमें नकली लोकेशन दिखाकर पूरी तरह से सिग्नल को भ्रमित कर दिया जाता है. इसके जरिए दुश्मन के सटीक हमलों को बेकार कर दिया जाता है. 

युद्ध में GPS जैमिंग का कैसे किया जाता है इस्तेमाल:

युद्ध में GPS जैमिंग का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पड़ रहा है. यहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है. जब से ईरान युद्ध शुरू हुआ है, तब से एक दिन में ही 1,100 से ज्यादा जहाजों का GPS और AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) गड़बड़ा गया. जहाजों को गलत जगह दिखाई जा रही थी. इस वजह से शिपिंग कंपनियों में काफी डर था. कई टैंकर अपनी रफ्तार कम कर रहे हैं, रास्ता बदल रहे हैं या रुक गए हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ट्रैफिक लगभग रुक गया है. जहाजों के अलावा एयरक्राफ्ट्स को भी परेशानी हो रही है. 

खराब मौसम या लैंडिंग के समय अगर GPS काम न करे तो पायलट कन्फ्यूज हो सकते हैं. हालांकि, विमानों में INS (इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम) जैसा बैकअप होता है, लेकिन फिर भी खतरा बढ़ गया है. ईरान इस तकनीक का इस्तेमाल दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को भटकाने के लिए कर रहा है. वहीं, इजराइल और अमेरिका भी अपने ठिकानों की रक्षा के लिए जैमिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं.

लोगों पर कैसा पड़ रहा है असर: 

GPS जैमिंग का असर सिर्फ युद्ध तक नहीं है. आम लोगों की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है. मोबाइल फोन में गलत लोकेशन दिख रही है, कैब सर्विस जैसे उबर या लोकल ऐप्स ठीक से काम नहीं कर रहे, मैप्स गड़बड़ हो गए हैं. ईरान में तो राइड-हेलिंग और डिलीवरी सेवाएं महीनों से परेशान हैं.