ChatGPT की सफलता के बाद AI की दुनिया पूरी तरह बदल गई लेकिन अब OpenAI के एक कर्मचारी ने बड़ा दावा किया है. उनके अनुसार, Google के पास ChatGPT जैसी तकनीक पहले से मौजूद थी लेकिन कंपनी ने संभावित जोखिमों और अपने सर्च बिजनेस को बचाने के लिए उसे लॉन्च नहीं किया.
OpenAI में काम कर रहे थिबो 'टीबो' सोटियॉक्स, जो पहले Google DeepMind का हिस्सा थे. दावा किया कि Google के पास ChatGPT जैसी क्षमता वाला AI चैटबॉट पहले से मौजूद था. उनके मुताबिक, कंपनी को डर था कि अगर ऐसा चैटबॉट आम लोगों के लिए लॉन्च कर दिया गया तो उसका असर Google के सर्च बिजनेस पर पड़ सकता है. इसी वजह से DeepMind को ऐसे प्रोडक्ट लॉन्च करने की अनुमति नहीं दी गई जो कंपनी के मुख्य कारोबार को नुकसान पहुंचा सकते थे. सोटियॉक्स ने कहा कि वह आज भी इस फैसले के बारे में सोचते हैं और मानते हैं कि Google उस समय AI की दौड़ में आगे रह सकता था.
आज जिस तकनीक पर ChatGPT जैसे AI मॉडल काम करते हैं, उसकी नींव Google ने ही रखी थी. साल 2017 में कंपनी ने अपना चर्चित रिसर्च पेपर 'Attention Is All You Need' पेश किया था, जिसमें Transformer आर्किटेक्चर को दुनिया के सामने लाया गया. यही तकनीक बाद में GPT यानी 'Generative Pre-trained Transformer' का आधार बनी. इसके बावजूद Google ने अपने AI मॉडल को सार्वजनिक नहीं किया. बाद में OpenAI ने ChatGPT लॉन्च कर AI बाजार में बड़ी बढ़त बना ली. इसके बाद Google ने पहले Bard और फिर Gemini को पेश किया, ताकि वह इस तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत कर सके.
रिपोर्ट के अनुसार, Google ने LaMDA, PaLM और Meena जैसे कई एडवांस AI मॉडल पहले ही तैयार कर लिए थे लेकिन उन्हें सीमित दायरे में ही रखा गया. कंपनी को डर था कि AI कभी-कभी गलत या मनगढ़ंत जानकारी दे सकता है, जिसे AI की भाषा में 'हैलुसिनेशन' कहा जाता है. Google का मानना था कि उसके यूजर्स सर्च के जवाबों पर भरोसा करते हैं, इसलिए बिना पूरी तरह भरोसेमंद तकनीक के चैटबॉट लॉन्च करना जोखिम भरा हो सकता है. दूसरी ओर, OpenAI ने ChatGPT लॉन्च किया और कुछ ही समय में करोड़ों यूजर्स तक पहुंच गया. इसके बाद AI इंडस्ट्री की दिशा पूरी तरह बदल गई और Google को भी अपनी रणनीति तेज करनी पड़ी.