पिथौरागढ़: उत्तराखंड की देवभूमि में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी महिमा दूर-दूर तक सुनाई देती है. इन्हीं में से एक है पिथौरागढ़ की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां उल्का देवी मंदिर. हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आधिकारिक संदेश दिया है. प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस मंदिर को स्थानीय लोग क्षेत्र की रक्षिका के रूप में पूजते हैं. मान्यता है कि मां उल्का देवी अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि तथा सुरक्षा का आशीर्वाद देती हैं. यही कारण है कि सालभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है.
उत्तराखंड की देवभूमि में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी महिमा दूर-दूर तक सुनाई देती है. इन्हीं में से एक है पिथौरागढ़ की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां उल्का देवी मंदिर. हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने आधिकारिक संदेश में इस मंदिर को श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बताते हुए लोगों से यहां दर्शन करने की अपील की है.
सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में स्थित माँ उल्का देवी मंदिर श्रद्धा और विश्वास का एक दिव्य केंद्र है। मनोरम प्राकृतिक छटा के मध्य विराजमान माँ उल्का देवी को इस क्षेत्र की रक्षिका माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि माँ अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर उन्हें सुख, समृद्धि और संरक्षण प्रदान… pic.twitter.com/87S2WRyJ9L
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) June 12, 2026
पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है. यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ प्रकृति के अद्भुत नजारे भी देखने को मिलते हैं. मंदिर परिसर से पूरे पिथौरागढ़ शहर का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है.
मां उल्का देवी मंदिर सिर्फ धार्मिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक आकर्षण के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां से दिखाई देने वाला सूर्योदय और सूर्यास्त हर आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर देता है. पहाड़ों के बीच फैली हरियाली और शांत वातावरण लोगों को विशेष अनुभव प्रदान करता है.
स्थानीय लोगों के बीच मां उल्का देवी को ‘सोर की भगवती’ के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर परिसर भक्तों की आस्था और भक्ति से सराबोर दिखाई देता है.
लोक मान्यताओं के अनुसार मां उल्का देवी क्षेत्र को प्राकृतिक आपदाओं और गंभीर बीमारियों से बचाती हैं. इसी विश्वास के कारण स्थानीय लोगों की इस मंदिर से गहरी आस्था जुड़ी हुई है. कई श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूरी होने के बाद यहां विशेष पूजा कराने आते हैं.
माना जाता है कि गोरखा समुदाय ने अपने शासनकाल के दौरान पर्वत शिखर पर इस मंदिर की स्थापना कराई थी. उस समय मां उल्का देवी को गोरखा समाज अपनी कुलदेवी के रूप में पूजता था. यह इतिहास मंदिर की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है.
मंदिर का जीर्णोद्धार बाद में सेरा गांव के मेहता परिवार द्वारा कराया गया. चैत महीने में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध चैतोल उत्सव के दौरान यहां विशेष धार्मिक कार्यक्रम होते हैं. इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मां के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.