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क्या आप जानते हैं नैनीताल का सबसे बड़ा राज? कभी इस पवित्र तीर्थ को दुनिया से छिपाकर रखा गया था

आज का नैनीताल भले ही देश का प्रसिद्ध हिल स्टेशन हो, लेकिन इसका इतिहास एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में जुड़ा हुआ है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नैनी झील को त्रि ऋषि सरोवर कहा जाता था.

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Edited By: Reepu Kumari
क्या आप जानते हैं नैनीताल का सबसे बड़ा राज? कभी इस पवित्र तीर्थ को दुनिया से छिपाकर रखा गया था
Courtesy: Grok

नैनीताल का नाम सुनते ही सबसे पहले खूबसूरत झील, पहाड़ और पर्यटन की तस्वीर सामने आती है. लेकिन इस प्रसिद्ध हिल स्टेशन का एक ऐसा इतिहास भी है, जिससे आज भी बहुत कम लोग परिचित हैं. इसकी पहचान कभी सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं थी. इतिहास और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नैनीताल सदियों तक एक प्रमुख तीर्थस्थल रहा. यहां आने वाले श्रद्धालु धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक शांति की तलाश में पहुंचते थे. समय के साथ इसका स्वरूप बदला और यह दुनिया के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल हो गया.

तीर्थस्थल के रूप में थी नैनीताल की पहचान

आज जिस नैनीताल को लोग पर्यटन नगरी के रूप में जानते हैं, वह कभी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र था. स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, श्रद्धालु पहले खुरपाताल में स्नान करते थे. इसके बाद वे हनुमानगढ़ से नंगे पैर पैदल चलकर मां नैना देवी के दर्शन के लिए पहुंचते थे. इसे श्रद्धा, तप और समर्पण का प्रतीक माना जाता था.

त्रि ऋषि सरोवर से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

पौराणिक ग्रंथों में नैनी झील का उल्लेख त्रि ऋषि सरोवर के रूप में मिलता है. मान्यता है कि महर्षि अत्रि, पुलस्त्य और पुलह ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान यहां तपस्या कर एक पवित्र कुंड का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर का जल स्थापित किया. तभी से इस सरोवर को अत्यंत पवित्र माना जाने लगा और इसके जल को पुण्यदायी बताया गया.

इतिहासकार ने बताई सदियों पुरानी परंपरा

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार, सदियों तक नैनीताल केवल स्थानीय लोगों, साधु-संतों और श्रद्धालुओं के बीच ही प्रसिद्ध था. श्रद्धालु हनुमानगढ़ से जूते-चप्पल उतारकर नंगे पैर नैनी झील तक पहुंचते थे और स्नान के बाद मां नैना देवी के दर्शन करते थे. यह परंपरा विनम्रता और गहरी आस्था का प्रतीक मानी जाती थी.

कमिश्नर ट्रेल ने क्यों छिपाकर रखा नैनीताल?

इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1813 में कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर जी.डब्ल्यू. ट्रेल को इस स्थान की जानकारी मिली. भारतीय धार्मिक परंपराओं से प्रभावित ट्रेल ने इसकी आध्यात्मिक महत्ता को देखते हुए लंबे समय तक इस स्थान को बाहरी दुनिया से छिपाकर रखा. बाद में अंग्रेज यात्री पीटर बैरन ने अपनी पुस्तक 'Wanderings in the Himalaya' में इसका उल्लेख किया, जिसके बाद नैनीताल दुनिया की नजर में आया.

आस्था से पर्यटन तक का सफर

ब्रिटिश काल में यहां सड़कें, भवन और अन्य सुविधाएं विकसित होने लगीं, जिसके बाद नैनीताल धीरे-धीरे एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन बन गया. आज नैनी झील, माल रोड और आसपास के दर्शनीय स्थल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. इसके बावजूद मां नैना देवी मंदिर और नैनी झील की धार्मिक आस्था आज भी पहले की तरह कायम है. यही कारण है कि नैनीताल आज पर्यटन और आध्यात्मिक विरासत, दोनों की अनूठी पहचान बना हुआ है.