menu-icon
India Daily

कैप्टन मनोज पांडे की अनसुनी कहानी, शहादत के बाद जब खुला ताबूत; अंदर रखी उस छोटी-सी चीज को आज भी दुनिया करती है याद

कारगिल युद्ध के परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडे की प्रेरणादायक कहानी. जानिए बचपन की बांसुरी, संघर्ष, एनडीए इंटरव्यू और शहादत से जुड़े भावुक किस्से.

reepu
Edited By: Reepu Kumari
कैप्टन मनोज पांडे की अनसुनी कहानी, शहादत के बाद जब खुला ताबूत; अंदर रखी उस छोटी-सी चीज को आज भी दुनिया करती है याद
Courtesy: @pushkardhami

कारगिल युद्ध के नायक और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन मनोज पांडे का नाम भारतीय सेना के सबसे बहादुर योद्धाओं में गिना जाता है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका अदम्य साहस और शौर्य आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा. उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और देशभक्ति की मिसाल है. 3 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में मात्र 24 वर्ष की उम्र में कैप्टन मनोज पांडे वीरगति को प्राप्त हुए. युद्ध पर रवाना होने से पहले उन्होंने अपनी मां से वादा किया था कि 25वें जन्मदिन पर घर लौटेंगे. वह लौटे जरूर, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए. उनकी शहादत ने पूरे देश को गर्व और आंखों में आंसू दोनों दिए.

गरीबी में पला बचपन, लेकिन सपने हमेशा ऊंचे रहे

25 जून 1975 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रुधा गांव में जन्मे मनोज पांडे का बचपन आर्थिक तंगी में बीता. उनके पिता गोपीचंद्र पांडे लखनऊ के हसनगंज चौराहे पर पान की दुकान चलाते थे, जबकि मां मोहिनी परिवार की जिम्मेदारी संभालती थीं. कठिन परिस्थितियों के बावजूद मनोज ने कभी शिकायत नहीं की. वह स्कूल जाने के लिए मिलने वाला रिक्शे का किराया भी बचा लेते थे और पैदल स्कूल पहुंच जाते थे.

बड़े बेटे होने के नाते वह अपने छोटे भाइयों को मेहनत से पढ़ने की सलाह देते थे. उनका मानना था कि पिता की मेहनत की कमाई का सम्मान होना चाहिए. पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाले मनोज को लगातार छात्रवृत्ति मिलती रही. उनका एक ही लक्ष्य था कि वह भारतीय सेना में अधिकारी बनकर देश की सेवा करें.

सीएम धामी ने बलिदान दिवस पर किया नमन

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कैप्टन मनोज पांडे के बलिदान दिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर लिखा, 'कारगिल युद्ध में अदम्य शौर्य एवं साहस के परिचायक परमवीर चक्र से अलंकृत मनोज कुमार पांडे जी के बलिदान दिवस पर कोटिशः नमन. आपकी शौर्य गाथा सदैव हमें राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी.' मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के लिए दिया गया उनका सर्वोच्च बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा और उनकी वीरता आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी.

ढाई साल की उम्र में खरीदी बांसुरी बनी आखिरी याद

मनोज की मां के अनुसार, जब वह करीब ढाई साल के थे तब शीतला मंदिर के मेले में उन्हें खिलौना खरीदने का मौका मिला. वहां बंदूक, गेंद और दूसरे खिलौने मौजूद थे, लेकिन मनोज ने केवल दो रुपये की एक छोटी बांसुरी चुनी. उन्होंने उसे बजाना भी सीखा और वह बांसुरी जीवनभर उनके साथ रही.

कारगिल युद्ध में शहीद होने के बाद जब उनका पार्थिव शरीर लखनऊ पहुंचा, तब उसी ताबूत में उनकी बचपन की वह बांसुरी भी मौजूद थी. यह दृश्य परिवार के लिए बेहद भावुक था. वह साधारण बांसुरी आज उनके जीवन के संघर्ष, सादगी और संवेदनशील व्यक्तित्व की सबसे अनमोल निशानी मानी जाती है.

एनडीए इंटरव्यू में दिया ऐसा जवाब, जिसे सुनकर सब रह गए थे हैरान

मनोज पांडे ने आठवीं तक पढ़ाई लखनऊ के रानी लक्ष्मी बाई मेमोरियल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में की. इसके बाद उन्होंने आर्मी स्कूल में प्रवेश लिया, जहां उनका सेना में जाने का सपना और मजबूत हुआ. पढ़ाई और खेल दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद उन्होंने एनडीए की लिखित परीक्षा पास कर ली.

इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछा गया कि वह सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं. मनोज ने बिना झिझक जवाब दिया कि उन्हें परमवीर चक्र जीतना है. जब अधिकारियों ने पूछा कि क्या उन्हें पता है यह सम्मान कैसे मिलता है, तो उन्होंने कहा कि अधिकतर लोगों को यह मरणोपरांत मिलता है, लेकिन यदि मौका मिला तो वह इसे जीवित लेकर आएंगे. उनका यह आत्मविश्वास आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा है.

गोरखा राइफल्स चुनी और शौर्य की नई मिसाल कायम की

6 जून 1995 को मनोज पांडे भारतीय सेना की 1/11 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त अधिकारी बने. उन्होंने उसी बटालियन को चुना जिसे सबसे बहादुर सैनिकों की टुकड़ी माना जाता है. वह पूरी तरह शाकाहारी थे और शराब व सिगरेट से दूर रहते थे. गोरखा राइफल्स की परंपराओं का भी उन्होंने पूरी निष्ठा से पालन किया.

कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन के कई ठिकानों को ध्वस्त किया और अपने प्राण न्योछावर कर दिए. उनके सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया. आज भी कैप्टन मनोज पांडे का जीवन हर भारतीय के लिए साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की अमर प्रेरणा बना हुआ है.