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मदरसों की मान्यता और अनुदान पर बड़ा सवाल! बाराबंकी से आजमगढ़ तक कैसे सामने आया फर्जीवाड़े का जाल?

वर्ष 2023 में शासन के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के समस्त राज्यानुदानित मदरसों की भूमि, भवन और अन्य मानकों का जिला स्तर पर समितियां गठित कर सत्यापन कराया गया था.

Shilpa Shrivastava
Anuj Kumar
Reported By: Anuj Kumar
मदरसों की मान्यता और अनुदान पर बड़ा सवाल! बाराबंकी से आजमगढ़ तक कैसे सामने आया फर्जीवाड़े का जाल?
Courtesy: Pinterest

लखनऊ: वर्ष 2023 में शासन के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के समस्त राज्यानुदानित मदरसों की भूमि, भवन और अन्य मानकों का जिला स्तर पर समितियां गठित कर सत्यापन कराया गया था. लेकिन अब यही विभागीय सत्यापन खुद सवालों के कठघरे में खड़ा हो गया है. जिस सत्यापन के आधार पर राज्यानुदानित मदरसों को मानकों के अनुरूप बताया गया, उसी के बाद अलग-अलग जनपदों में सामने आ रही जांच रिपोर्टों ने पूरे सत्यापन तंत्र की पोल खोलकर रख दी है.

बाराबंकी का दारुल उलूम पीरबटावन हो, कुशीनगर का अंजुमन इस्लामिया फैजुल उलूम फाजिलनगर या आजमगढ़ का जामिया नूरुल उलूम मुबारकपुर, एक के बाद एक सामने आ रहे मामले अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर वर्ष 2023 में जिला स्तरीय सत्यापन समितियों ने जांच के नाम पर क्या देखा था और क्या नहीं देखा था?

बाराबंकी में तहसीलदार नवाबगंज की जांच रिपोर्ट में राज्यानुदानित मदरसा दारुल उलूम पीरबटावन की भूमि को लेकर गंभीर राजस्व तथ्य सामने आए हैं. जिस जमीन पर मदरसा संचालित है, उसके सरकारी/नजूल भूमि से जुड़े होने की बात जांच में सामने आई है. ऐसे में सवाल सीधा है, यदि जमीन की वास्तविक स्थिति राजस्व अभिलेखों में मौजूद थी, तो वर्ष 2023 में सत्यापन करने वाली समिति की नजर वहां तक क्यों नहीं पहुंची?

आजमगढ़ में जामिया नूरुल उलूम मुबारकपुर का मामला तो इससे भी आगे पहुंच चुका है. मदरसा शिक्षा परिषद की कार्रवाई में मान्यता से जुड़े अभिलेखों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए और FIR दर्ज कराने के निर्देश तक जारी हुए. फिर सवाल यह है कि जिस संस्था के मान्यता संबंधी दस्तावेजों पर बाद में सवाल खड़े हो सकते हैं, उसका सत्यापन पहले किस आधार पर किया गया था?

यही हाल कुशीनगर के अंजुमन इस्लामिया फैजुल उलूम फाजिलनगर समेत अन्य मामलों में सामने आ रही शिकायतों और जांचों ने भी पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

एक तरफ विभागीय फाइलों में मदरसे अपनी जमीन पर और मानकों के अनुरूप दिखाई देते हैं, दूसरी तरफ जब मामला जिलाधिकारी, तहसील और राजस्व विभाग की जांच तक पहुंचता है तो जमीन सरकारी, नजूल अथवा विवादित अभिलेखों वाली निकलने के आरोप सामने आते हैं. आखिर यह दोहरी तस्वीर क्यों?

क्या विभागीय सत्यापन सिर्फ फाइलों की खानापूर्ति था?

राज्यानुदानित मदरसों को सरकारी खजाने से मिलने वाले अनुदान और वेतन भुगतान के बीच यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि जिस संस्था की जमीन, मान्यता या अन्य मूलभूत पात्रता पर ही सवाल खड़े हों, उसे सरकारी अनुदान के लिए पात्र कैसे माना गया?

सबसे बड़ा सवाल विभागीय अधिकारियों पर:

  • अब सवाल सिर्फ मदरसा प्रबंधन से नहीं बल्कि उन अधिकारियों और जिला स्तरीय समितियों से भी होना चाहिए जिन्होंने वर्ष 2023 में इन मदरसों का सत्यापन किया था. यदि उस समय सब कुछ नियमानुसार था तो आज अलग-अलग सरकारी जांचों में गंभीर विसंगतियां क्यों सामने आ रही हैं?

  • क्या सत्यापन के दौरान राजस्व अभिलेखों की जांच नहीं हुई थी?

  • क्या भूमि के स्वामित्व और वैध दस्तावेजों का परीक्षण नहीं हुआ था?

  • क्या मान्यता से जुड़े मूल अभिलेखों की वास्तविकता की जांच नहीं हुई थी?

  • या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद कर रिपोर्ट तैयार कर दी गई?

बाराबंकी से आजमगढ़ तक सामने आ रहे मामले अब किसी एक मदरसे की कहानी नहीं रह गए हैं. ये मामले उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहे हैं जिसके जरिए राज्यानुदानित मदरसों का सत्यापन, मान्यता और सरकारी अनुदान सुनिश्चित किया गया.

यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी मदरसे ने गलत अथवा कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर मान्यता या सरकारी अनुदान हासिल किया, तो जिम्मेदारी केवल संबंधित प्रबंधन की तय होना पर्याप्त नहीं होगा. यह भी जांचना होगा कि सरकारी अधिकारियों ने उन दस्तावेजों को सत्यापित कैसे किया और वर्षों तक सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें सही कैसे माना गया.

अब खुलना चाहिए 2023 के सत्यापन का पूरा चिट्ठा:

जरूरत इस बात की है कि उत्तर प्रदेश के सभी राज्यानुदानित मदरसों के वर्ष 2023 के भूमि-भवन एवं अन्य मानकों के सत्यापन की रिपोर्टों का स्वतंत्र और उच्चस्तरीय पुनरीक्षण कराया जाए. संबंधित समितियों की रिपोर्ट, उनके आधार में लगाए गए अभिलेख और सत्यापन करने वाले अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक जांच के दायरे में लाई जाए.

क्योंकि सवाल सिर्फ मदरसों का नहीं है, सवाल उस सरकारी व्यवस्था का है जिसने इन संस्थाओं को मानकों के अनुरूप बताकर सरकारी अनुदान का रास्ता साफ किया. अब अगर बाद की जांचें गलत हैं तो सरकार बताए कि राजस्व विभाग की रिपोर्ट गलत क्यों है. और अगर राजस्व जांच सही है, तो फिर वर्ष 2023 का विभागीय सत्यापन किस आधार पर हुआ था?

यही वह सवाल है जिसका जवाब अब अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और मदरसा शिक्षा परिषद को देना ही होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि 2023 का सत्यापन कागजों पर ही पूरा कर दिया गया और इसी कथित खानापूर्ति की कीमत सरकारी खजाने ने वर्षों तक चुकाई?

मामले की परतें जिस तेजी से खुल रही हैं, उससे आने वाले समय में इसकी जांच भ्रष्टाचार निवारण संगठन और विजिलेंस जैसी एजेंसियों तक पहुंचने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.