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निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना पर नहीं लगा सकता कोई रोक, मौलिक अधिकारों पर लगी इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुहर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि प्राइवेट जगहों पर धार्मिक अनुष्ठान करना एक मौलिक अधिकार है और इसके लिए इजाजत की जरूरत नहीं है. हालांकि सार्वजनिक जगहों पर होने वाली धार्मिक सभाओं पर नियम लागू रहेंगे.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना पर नहीं लगा सकता कोई रोक, मौलिक अधिकारों पर लगी इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुहर
Courtesy: Pinterest

इलाहाबाद: उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ किया है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को अपने निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना सभाएं आयोजित करने के लिए राज्य सरकार या प्रशासन से पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का हिस्सा है, जिसे सामान्य परिस्थितियों में प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता.

अपने फैसले में अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता है. जब कोई धार्मिक गतिविधि पूरी तरह से निजी संपत्ति के अंदर और शांतिपूर्ण तरीके से की जा रही हो, तो उसे कानूनी अनुमति के अधीन करना उचित नहीं है. ऐसे मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा.

कोर्ट ने क्या रखी शर्त?

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह स्वतंत्रता तभी मान्य होगी जब धार्मिक प्रार्थना सभा पूरी तरह से निजी परिसर में आयोजित की जाए. यदि सभा का स्वरूप ऐसा है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र को प्रभावित करता है, या सार्वजनिक व्यवस्था, शांति या यातायात में बाधा डालता है, तो प्रशासन आवश्यक कदम उठा सकता है.

सार्वजनिक स्थानों के लिए क्या है नियम?

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह की धार्मिक सभा, कार्यक्रम या जुलूस आयोजित करने से पहले संबंधित पुलिस या प्रशासन को सूचित करना अनिवार्य होगा. सार्वजनिक स्थानों पर कार्यक्रमों के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है, इसलिए ऐसे मामलों में नियमों का पालन करना ज़रूरी है.

क्या है मामला?

यह फैसला निजी परिसर में प्रार्थना सभाएं आयोजित करने पर प्रशासनिक आपत्तियों को चुनौती देने वाली एक याचिका की सुनवाई के दौरान आया. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि निजी संपत्ति पर शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधि को प्रतिबंधित करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. इस तर्क पर कोर्ट ने सहमति जताई और प्रशासनिक कार्रवाई को अनुचित माना.