जयपुर: राजस्थान में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है, जहां सरकार ने स्थानीय चुनावों में उम्मीदवारों पर लगे दो-बच्चा प्रतिबंध को समाप्त कर दिया है. यह कानून 1995 में भैरों सिंह शेखावत सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाया था.
अब विधानसभा में दो दिनों की बहस के बाद यह बदलाव आया है. सरकार का कहना है कि इससे सक्षम लोग सार्वजनिक सेवा में आ सकेंगे, भले उनके बच्चे ज्यादा हों. लेकिन विपक्ष इसे वैचारिक साजिश बता रहा है. कल्याण योजनाओं और नौकरियों में नियम जस का तस रहेगा.
1995 में राजस्थान में दो-बच्चों का नियम लागू हुआ, जो चुनाव लड़ने वालों पर जनसंख्या नियंत्रण के लिए था. 2002 में कांग्रेस सरकार ने इसे सरकारी नौकरियों तक बढ़ाया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में सही ठहराया. कोर्ट ने कहा कि यह परिवार नियोजन को बढ़ावा देता है और भेदभावपूर्ण नहीं है. अब चुनावी क्षेत्र में यह नियम हटाया गया है, लेकिन अन्य क्षेत्रों में बरकरार है.
9 और 10 मार्च को विधानसभा में इस मुद्दे पर गर्मागर्म चर्चा हुई. दोनों दलों के करीब 30 विधायकों ने अपनी राय रखी. सरकार ने कहा कि यह कदम उन लोगों को मौका देगा जो योग्य हैं लेकिन बच्चे ज्यादा होने से चुनाव नहीं लड़ पाते. संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने वैज्ञानिक आधार बताया, कि प्रजनन दर 3.2 से घटकर 2 पर आ गई है.
कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित बताया और राजनीतिक उद्देश्य करार दिया. उन्होंने पूछा कि जनसंख्या नियंत्रण हुआ या नहीं, और कल्याण योजनाओं में नियम क्यों नहीं बदला. सरकार ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि आरएसएस राजनीति में दखल नहीं देता. विशेषज्ञों के मुताबिक अब जनसंख्या विस्फोट का खतरा नहीं है.
सरकारी नौकरियों में जून 2002 के बाद जन्मे तीसरे बच्चे वाले अयोग्य रहेंगे. कल्याण योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री मातृ वंदना, मुख्यमंत्री राजश्री, मातृत्व पोषण योजना में लाभ दो बच्चों तक सीमित है. निर्माण श्रमिकों के बच्चों की छात्रवृत्ति भी इसी नियम से बंधी है. अधिकारियों ने कहा कि फिलहाल इनमें छूट की कोई योजना नहीं है.