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India Daily

मुंबई की हवा सुधारने के लिए फूंक दिए 493 करोड़ फिर भी गिर गई रैंकिंग, गायब रहीं 1,000 ईवी बसें

हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए 493 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद मुंबई की एयर क्वालिटी रैंकिंग गिर गई है. वहीं BEST बेड़े में इलेक्ट्रिक बसों की डिलीवरी भी अधूरी पड़ी है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
मुंबई की हवा सुधारने के लिए फूंक दिए 493 करोड़ फिर भी गिर गई रैंकिंग, गायब रहीं 1,000 ईवी बसें
Courtesy: pinterest

मुंबई में वायु प्रदूषण से निपटने और हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) ने 15वें वित्त आयोग से प्राप्त 620.11 करोड़ रुपये के अनुदान में से 573.88 करोड़ रुपये (लगभग 92.54%) खर्च कर दिए हैं. इसके बावजूद राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में मुंबई की रैंकिंग घटकर 28वें स्थान पर आ गई है, जबकि 2025 में यह 25वें और 2023 में 10वें स्थान पर थी. सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि भारी भरकम धन आवंटन के बाद भी वायु गुणवत्ता के मोर्चे पर शहर की स्थिति लगातार बिगड़ी है.

ईवी बसों पर भारी खर्च और आपूर्ति में देरी

प्राप्त कुल अनुदान में से लगभग 80 प्रतिशत राशि यानी 493.37 करोड़ रुपये बीईएसटी (BEST) के लिए 'वेट लीज' मॉडल पर इलेक्ट्रिक बसें खरीदने में लगा दी गई. हालांकि, बसों की खरीद में हुई देरी के कारण सार्वजनिक परिवहन बेड़े की स्थिति कमजोर हुई है. 2021-22 में BEST के पास कुल 3,546 बसें थीं, जो 2026-27 तक घटकर 2,532 रह गईं. मार्च 2022 में 2,100 इलेक्ट्रिक बसों का टेंडर जारी किया गया था और अगस्त 2023 तक आपूर्ति पूरी होनी थी, लेकिन अधिकारियों के मुताबिक लगभग आधी बसें आज तक नहीं सौंपी गई हैं.

प्रदूषण के मुख्य कारणों की अनदेखी पर सवाल

BMC की अपनी 'मुंबई वायु प्रदूषण शमन योजना' ने निर्माण कार्य की धूल, सड़क की उड़ती धूल और कचरा जलाने को प्रदूषण का सबसे मुख्य कारक माना था. इसके बावजूद, अधिकांश फंड इलेक्ट्रिक वाहनों पर केंद्रित कर दिया गया. शेष बचे बजट में से 21.47 करोड़ रुपये कचरा प्रसंस्करण संयंत्र, 9.27 करोड़ रुपये हरित क्षेत्र बढ़ाने और 8.47 करोड़ रुपये श्मशान घाटों में पीएनजी गैस पाइपलाइन लगाने के लिए तय किए गए. वहीं अनुसंधान और वास्तविक प्रदूषण हॉटस्पॉट की पहचान के लिए आईआईटी बॉम्बे को केवल 50 लाख रुपये और हॉटस्पॉट पहचान के लिए 36 लाख रुपये जैसे बेहद सीमित संसाधन आवंटित किए गए.

केंद्रीय मंत्रालय और नागरिक प्रशासन का रुख

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अनुदान का एक निश्चित हिस्सा केवल ईवी पर खर्च करने का कोई अनिवार्य नियम नहीं था. मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि यदि बसें नहीं खरीदी जा पा रही हैं, तो इस राशि को अन्य प्रदूषण नियंत्रण कार्यों में लगाया जाना चाहिए था. दूसरी ओर, नगर निगम अधिकारियों का तर्क है कि तटीय सड़क (कोस्टल रोड) और नवी मुंबई हवाई अड्डे जैसे बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण के चलते धूल का फैलाव बढ़ा था. प्रशासन की प्राथमिकता वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की थी, इसीलिए ईवी बसों पर अधिक संसाधन लगाए गए.

विशेषज्ञों की राय और भविष्य की दिशा

पर्यावरण और वायुमंडल विशेषज्ञों का मानना है कि फंड का बेहतर उपयोग स्थानीय स्तर पर प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करने में किया जाना चाहिए था. विशेषज्ञों के अनुसार, इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार के लिए परिवहन मंत्रालय पहले से मौजूद है, ऐसे में स्वच्छ वायु कोष का बड़ा हिस्सा बसों पर खर्च करने के बजाय स्थानीय हॉटस्पॉट और शोध-आधारित समाधानों पर लगाया जाना चाहिए था. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक निर्माण धूल और स्थानीय कचरा जलाने जैसी जमीनी समस्याओं का सटीक वैज्ञानिक समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक केवल वाहन बदलने से वायु गुणवत्ता में बड़ा सुधार पाना मुश्किल है.