नई दिल्ली: वजन घटाने की कहानियां अक्सर बहुत सख्त नियमों और भारी रूटीन से भरी होती हैं. लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जो शांति से आगे बढ़ती हैं. ऐसी ही कहानी केट डेनियल की भी है. उन्होंने 70 किलो से ज्यादा वजन कम किया लेकिन किसी अलग डाइट या एक्सरसाइज से नहीं. उन्होंने अपने दिन जीने का तरीका बदला और वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया.
केट ने दिन की शुरुआत जल्दी उठकर की. इसका मकसद ज्यादा काम करना नहीं था बल्कि खुद के लिए समय निकालना था. सुबह उन्होंने अपने शरीर को हल्का हिलाया, कुछ अच्छा सुना और दिन की योजना बनाई. इससे उन्हें दिन शुरू होने से पहले ही नियंत्रण और आत्मविश्वास का एहसास मिलने लगा.
यह फैसला सख्ती के लिए नहीं बल्कि शांति के लिए था. केट ने चीनी और गेहूं जैसे रिफाइंड कार्ब्स को हटाया. इससे खाने की बेवजह की क्रेविंग कम हुई और शरीर को संतुलन मिला. उनका कहना है कि इस बदलाव से न सिर्फ वजन घटा बल्कि दिमाग को भी सुकून मिला.
खाना बनाना और तय करना उनके लिए सजा नहीं बल्कि आत्म देखभाल बन गया. पहले से खाने की तैयारी करने से फैसले लेने की थकान कम हुई. पेट भरा रहता था और किचन में गलत चुनाव करने की नौबत नहीं आती थी. यह आदत उनकी स्थिरता की बड़ी वजह बनी.
केट के लिए वजन घटाना सिर्फ शरीर का नहीं था. उन्होंने अपने खाने, शरीर और खुद से रिश्ते को समझने पर काम किया. जैसे ही उन्होंने खुद को अपनाना शुरू किया, भावनात्मक खालीपन भरने के लिए खाने की जरूरत कम होती चली गई. यह बदलाव बाहर से ज्यादा अंदर महसूस हुआ.
हर बदलाव डाइट या एक्सरसाइज़ से जुड़ा नहीं था. केट ने कुछ रिश्तों और चीजों को छोड़ा. इसलिए नहीं कि वे गलत थे बल्कि इसलिए कि वह खुद बदल रही थीं. नए इंसान बनने के लिए उन्होंने उन चीजों के लिए जगह बनाई जो अब उनके जीवन से मेल खाती थीं.
केट ने सिर्फ किलो घटाने का लक्ष्य नहीं बनाया. उन्होंने यह सोचा कि वह कैसा महसूस करना चाहती हैं. हर दिन उन्होंने अपने भविष्य के बेहतर रूप को ध्यान में रखकर फैसले लिए. जब फीलिंग्स प्राथमिकता बनीं तो वजन अपने आप पीछे पीछे कम होता चला गया. एक्सरसाइज उनके लिए कभी सजा नहीं रही. उन्होंने इसे सौभाग्य की तरह देखा. बच्चों के साथ खेलना सीढ़ियां चढ़ पाना और खुद के जूते बांध पाना उनके लिए बड़ी उपलब्धि बन गया. धीरे धीरे यह आदत बनी और टिकाऊ साबित हुई.
सबसे बड़ा बदलाव अंदर हुआ. केट ने खुद से कठोर तरीके से बात करना बंद कर दिया. वह खुद की दोस्त कोच और सपोर्ट सिस्टम बन गईं. जब अंदर की आवाज़ साथ देने लगे तो किसी भी बदलाव को निभाना आसान हो जाता है.