नई दिल्ली: केंद्रीय बजट का दिन केवल आर्थिक नीतियों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहता है. इस दिन वित्त मंत्री का पहनावा भी लोगों की खास दिलचस्पी का विषय बन जाता है. निर्मला सीतारमण साल 2019 से लगातार बजट पेश कर रही हैं और हर बार उनकी साड़ी का लुक सुर्खियों में रहता है. बजट 2026 उनका नौवां बजट है और इस मौके पर भी उनका अंदाज लोगों का ध्यान अपनी साड़ी की ओर खींचा है.
बजट 2026 पेश करने से पहले निर्मला सीतारमण ने इस बार बैंगनी रंग की हाथ से बुनी कांचीपुरम सिल्क साड़ी पहनी है. यह साड़ी तमिलनाडु की पारंपरिक बुनाई से जुड़ी हुई है. साड़ी पर हल्के भूरे रंग के चेक बने हुए हैं, जो इसे एक सादा लेकिन क्लासिक लुक दे रहे हैं.
निर्मला सीतारमण की इस बैंगनी साड़ी में डार्क ब्राउन रंग का बॉर्डर है, जिसमें गोल्डन रंग का पतला किनारा दिया गया है. साड़ी में बारीक धागे का काम किया गया है, जो इसकी खूबसूरती को और निखारता है. यह साड़ी कट्टम कांजीवरम स्टाइल की है, जिसमें चेक पैटर्न साफ दिखाई दे रहे हैं. यह डिजाइन पारंपरिक होने के साथ साथ बेहद एलिगेंट भी लगती है.
निर्मला सीतारमण खुद तमिलनाडु से ताल्लुक रखती हैं. ऐसे में कांचीपुरम सिल्क साड़ी उनके लिए केवल पहनावा नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक भी है. हर साल बजट के दिन उनका लुक भारतीय हथकरघा और पारंपरिक कला को बढ़ावा देने का संदेश देता है.
पिछले साल बजट के दिन वित्त मंत्री ने ऑफ व्हाइट रंग की साड़ी पहनी थी. इस साड़ी पर सुनहरे रंग का बॉर्डर था और उस पर मधुबनी पेंटिंग बनी हुई थी. यह साड़ी उन्हें पद्म श्री से सम्मानित मधुबनी कलाकार दुलारी देवी ने तोहफ में दी थी. यह साड़ी बिहार की लोक कला को दर्शाती थी और देश में हर तरफ इसे खूब सराहा भी गया था.
साल 2024 में निर्मला सीतारमण ने बजट के दिन ऑफ व्हाइट रंग की मंगलगिरी साड़ी पहनी थी. इस साड़ी पर गहरे मैजेंटा रंग का बॉर्डर था. मंगलगिरी साड़ियां अपने सादे और सुरुचिपूर्ण लुक के लिए जानी जाती हैं. यह साड़ी आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले की पारंपरिक पहचान है.
साल 2023 के बजट के दिन वित्त मंत्री ने गहरे लाल रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी. इस साड़ी का बॉर्डर काले और सुनहरे रंग का था, जो मंदिर की बनावट जैसा दिखता था. बॉर्डर पर रथ मोर और कमल जैसे पारंपरिक डिजाइन बने हुए थे. यह साड़ी दक्षिण भारतीय परंपरा की झलक दिखा रही थी.
निर्मला सीतारमण का बजट लुक केवल फैशन का हिस्सा नहीं होता. उनके द्वारा चुनी गई साड़ियां हर साल देश के अलग अलग राज्यों की पारंपरिक कला और हथकरघा को सामने लाती हैं. इससे स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक बुनकरों को पहचान मिलती है.