नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने कई इलाकों में भारी तबाही मचाई. इसी दौरान नुवाकोट के बेत्रावती इलाके में एक घर बाढ़ और मलबे की चपेट में आ गया. इसी घर में चंडिका श्रेष्ठा भी फंस गई थीं. करीब 10 दिन तक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी.
परिवार और रिश्तेदारों ने काफी तलाश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो उन्होंने चंडिका के जिंदा होने की उम्मीद लगभग छोड़ दी. आठवें दिन परिवार ने उनकी मौत मानकर धार्मिक रस्में भी शुरू कर दी थीं. उनके शरीर की जगह कुश घास से प्रतीकात्मक पुतला बनाकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू की गई.
आपदा के 11वें दिन अचानक लोगों को चमत्कार दिखा. नेपाल के बेत्रावती में राहत और सड़क निर्माण से जुड़ी टीम इलाके में काम कर रही थी. इसी दौरान सुरक्षा बलों को मलबे में दबे एक घर के पास से हल्की आवाज सुनाई दी. जवानों ने आवाज की दिशा में मलबा हटाना शुरू किया. काफी मेहनत के बाद टीम ने घर की एक खिडकी तक पहुंच बनाई और वहां से अंदर जाने का रास्ता बनाया. इसके बाद चंडिका को बेहद कमजोर और अर्धचेतन अवस्था में बाहर निकाला गया. नेपाल के सशस्त्र पुलिस बल की नौ सदस्यीय टीम ने यह बचाव अभियान चलाया.
बचाव दल के मुताबिक बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि पूरा घर अपनी जगह से करीब 100 मीटर तक खिसक गया था. घर की निचली करीब साढे तीन मंजिलें मिट्टी और मलबे में दब गई थीं. ऊपर का कुछ हिस्सा ही दिखाई दे रहा था. इसी हिस्से में चंडिका फंसी हुई थीं. रेस्क्यू के बाद उन्हें हेलीकॉप्टर से पहले त्रिशूली स्थित नेपाली सेना के अस्पताल ले जाया गया. शुरुआती इलाज के बाद उन्हें आगे के उपचार के लिए काठमांडू ले जाया गया.
चंडिका के परिवार के लिए यह खबर किसी चमत्कार से कम नहीं थी. जिस महिला को परिवार मृत मान चुका था, उसी को अचानक जिंदा बचाए जाने की सूचना मिली. उनके रिश्तेदार तुरंत अस्पताल पहुंचे. वहां चंडिका को देखकर परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.