नई दिल्ली: माउंट एवरेस्ट पर हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही पहुंचते हैं. बेस कैंप पर बढ़ती गतिविधियों का असर अब ग्लेशियर पर भी दिखाई दे रहा है. नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों की स्टडी में सामने आया है कि ग्लोबल वार्मिंग के अलावा इंसानी गतिविधियां भी खुम्बु ग्लेशियर के पिघलने में योगदान दे रही हैं. अध्ययन के मुताबिक, पर्वतारोहियों के टेंट और बेस कैंप में इस्तेमाल होने वाली अलग अलग सुविधाओं से निकलने वाली गर्मी आसपास के तापमान को प्रभावित करती है. इसी के साथ इंसानी पेशाब से निकलने वाली गर्मी का भी कुछ असर बर्फ पर पड़ता है.
ऊंचाई पर रहने के दौरान पर्वतारोही ज्यादा पानी पीते हैं. इसी वजह से 2023 के क्लाइंबिंग सीजन में बेस कैंप पर रोजाना औसतन 6,766 लीटर पेशाब निकलने का अनुमान लगाया गया. वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार, इंसानी गतिविधियों से हर सीजन करीब 2,500 टन बर्फ पिघलकर पानी में बदल रही है. पेशाब को लेकर सामने आई बात को लेकर वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसे ग्लेशियर पिघलने का सबसे बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. शरीर से करीब 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर निकलने के बाद पेशाब तेजी से ठंडा हो जाता है.
अध्ययन के अनुसार, एक क्लाइंबिंग सीजन में इंसानी गतिविधियों से ग्लेशियर की करीब 154 टन बर्फ पिघल सकती है. लेकिन पेशाब की गर्मी का बहुत छोटा हिस्सा ही बर्फ तक पहुंचता है. इसका ज्यादातर हिस्सा आसपास की हवा और चट्टानों में चला जाता है. एवरेस्ट बेस कैंप पर करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं. इन टेंटों में किचन, जनरेटर, वाई फाई और शॉवर जैसी सुविधाएं होती हैं. इनसे निकलने वाली गर्मी जमीन के तापमान को बढ़ाने में योगदान देती है.
वैज्ञानिकों ने हिमालय में बढ़ते तापमान को लेकर चेतावनी दी है. उनके अनुसार, वर्ष 2000 के बाद बर्फ पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है. खुम्बु ग्लेशियर के बेस कैंप की सतह का तापमान भी हर साल 0.28 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है. अध्ययन के मुताबिक यह बदलाव भविष्य में बड़े संकट का संकेत हो सकता है. यानी एवरेस्ट पर बढ़ती इंसानी गतिविधियां केवल पर्यटकों और पर्वतारोहियों की संख्या तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर वहां मौजूद ग्लेशियर पर भी पड़ रहा है.