ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की अंतिम विदाई केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि इसने मध्य पूर्व की कूटनीति पर भी नई चर्चा छेड़ दी. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों की अलग-अलग मौजूदगी ने क्षेत्रीय रिश्तों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए. छह सदस्यीय GCC में से केवल सऊदी अरब, ओमान और कतर ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा. दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत की ओर से कोई आधिकारिक भागीदारी नहीं दिखी. ईरान के बयान के बाद इन देशों की अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं.
सऊदी अरब ने उप विदेश मंत्री वलीद अल-खुरैजी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजा. ओमान ने सुल्तान हैथम बिन तारिक के निर्देश पर उच्चस्तरीय दल को अंतिम विदाई में शामिल किया. कतर की ओर से शूरा काउंसिल के स्पीकर हसन बिन अब्दुल्लाह अल घानिम ने प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और ईरानी नेतृत्व के प्रति संवेदना व्यक्त की.
संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत की ओर से अंतिम विदाई में कोई आधिकारिक प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि जिन देशों ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का समर्थन किया या ईरान के खिलाफ अनुचित रुख अपनाया, उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया. हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम सार्वजनिक नहीं किया.
The Saudi Deputy Foreign Minister paid tribute to the martyred Leader of the Revolution. pic.twitter.com/WXDbfm1cQV
— Tehran Times (@TehranTimes79) July 3, 2026Also Read
ईरान ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किन देशों को औपचारिक निमंत्रण भेजा गया और किन्हें नहीं. इसी वजह से यह आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई कि यूएई, बहरीन और कुवैत को आमंत्रित नहीं किया गया था. फिर भी इन देशों की गैरमौजूदगी और ईरान के बयान को जोड़कर कई राजनीतिक विश्लेषण सामने आ रहे हैं.
ईरान ने बताया कि पूर्वी यूरोप के कुछ प्रतिनिधिमंडल समारोह में शामिल हुए, लेकिन अधिकांश यूरोपीय नेताओं को आमंत्रित नहीं किया गया. विदेश मंत्रालय का कहना है कि संघर्ष के दौरान कई यूरोपीय देशों ने ईरान का समर्थन नहीं किया, इसलिए उन्हें अंतिम विदाई में शामिल होने का नैतिक अधिकार नहीं रहा. हालांकि जॉर्जिया के राष्ट्रपति समारोह में मौजूद रहे.
खामेनेई की अंतिम विदाई में विभिन्न देशों की मौजूदगी और अनुपस्थिति को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा. इसे मध्य पूर्व के बदलते कूटनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. आने वाले समय में ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों पर इन घटनाओं का प्रभाव पड़ सकता है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी रहेगी.