प्रशांत महासागर में स्थित यप द्वीप विशाल पत्थर की डिस्क को राई स्टोन्स कहा जाता है. ये चूना पत्थर से बने गोलाकार पत्थर होते हैं, जिनके बीच में छेद रहता है. इनका आकार काफी बड़ा हो सकता है और कुछ पत्थरों का वजन कई टन तक पहुंचता है.
इन पत्थरों का इस्तेमाल केवल धन के प्रतीक के तौर पर नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण लेनदेन में भी किया जाता था. हालांकि आज रोजमर्रा की खरीदारी के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल होता है, लेकिन राई स्टोन्स की सामाजिक और सांस्कृतिक अहमियत अब भी बनी हुई है.
राई स्टोन्स की सबसे दिलचस्प खासियत इनका लेनदेन का तरीका था. भारी होने के कारण इन्हें हर बार उठाकर ले जाना संभव नहीं था. इसलिए किसी सौदे के बाद पत्थर अपनी जगह पर ही रहता था और समुदाय के लोग मौखिक रूप से नए मालिक को मान्यता देते थे. यानी पत्थर को स्थानांतरित किए बिना ही उसके मालिकाना हक में बदलाव हो जाता था. समुदाय की सामूहिक जानकारी इस व्यवस्था का आधार थी. यहां तक कि अगर कोई पत्थर समुद्र में डूब गया या कहीं खो गया, तब भी लोग उसके अस्तित्व, मूल्य और मालिकाना हक को स्वीकार कर सकते थे.
इन पत्थरों का चूना पत्थर यप द्वीप पर प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं था. इन्हें हासिल करने के लिए द्वीपवासियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर पलाऊ जाना पड़ता था. वहां पत्थरों को काटकर आकार दिया जाता और फिर नावों के जरिए यप लाया जाता था. इस पूरी प्रक्रिया में भारी शारीरिक मेहनत के साथ समुद्री यात्रा का जोखिम भी शामिल था. इसलिए किसी राई स्टोन की कीमत केवल उसके आकार या वजन से तय नहीं होती थी. उसे हासिल करने में लगा श्रम, संसाधन, यात्रा की कठिनाई और उससे जुड़ा जोखिम भी उसके मूल्य का हिस्सा था. राई स्टोन्स की इस व्यवस्था की तुलना कभी-कभी आधुनिक प्रूफ ऑफ वर्क अवधारणा से की जाती है, जिसका इस्तेमाल बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में होता है.
आधुनिक मुद्रा के आने के बावजूद राई स्टोन्स पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुए. रोजमर्रा की खरीदारी के लिए अमेरिकी डॉलर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन शादी, जमीन के लेनदेन, विवादों के समाधान और बड़े सामाजिक या राजनीतिक समझौतों जैसे महत्वपूर्ण मामलों में इन पत्थरों की पारंपरिक भूमिका आज भी देखी जाती है.