नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ईरान को लेकर सख्त तेवर दिखा रहे हैं. वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप के बयानों में और आक्रामकता आई है. इसी दौरान ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों की अब तक की सबसे बड़ी लहर देखी जा रही है. इन हालात में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका वाकई ईरान पर सैन्य हमला कर सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई बड़ी बाधाएं हैं.
ट्रंप के कड़े बयानों के बावजूद जमीन पर अमेरिकी सेना की बड़ी हलचल नजर नहीं आती. पेंटागन ने न तो कोई एयरक्राफ्ट कैरियर मिडिल ईस्ट भेजा है और न ही युद्ध जैसी तैयारी दिखाई दी है. खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगी भी ईरान पर हमले के लिए अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल को लेकर सतर्क हैं. यह स्थिति किसी तात्कालिक हमले के संकेत नहीं देती.
रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिकी हमला ईरान की सरकार के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. इससे तेहरान सरकार मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को विदेशी साजिश बताकर दबाने की कोशिश कर सकती है. इतिहास गवाह है कि बाहरी खतरे अक्सर आंतरिक असंतोष को कमजोर कर देते हैं. ऐसे में सत्ता के खिलाफ उठ रही आवाजें खुद सरकार के पक्ष में मुड़ सकती हैं.
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन के अनुसार अमेरिका ने हाल के महीनों में मिडिल ईस्ट से अपने कई सैन्य संसाधन हटा लिए हैं. USS जेराल्ड आर. फोर्ड को कैरेबियन और USS निमित्ज को अमेरिका के पश्चिमी तट पर तैनात किया गया है. ईरान पर हमला करने के लिए अमेरिका को कतर, बहरीन, यूएई या सऊदी अरब जैसे देशों से अनुमति लेनी होगी, जो आसान नहीं है.
अमेरिका के पास एक विकल्प जून 2025 जैसे सीमित हवाई हमले का हो सकता है, जब B-2 बॉम्बर्स से ईरान के फोर्डो परमाणु ठिकाने को निशाना बनाया गया था. लेकिन ईरान के कई ठिकाने घनी आबादी के बीच हैं. ऐसे में किसी भी हमले में नागरिक हताहतों का खतरा रहेगा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है.
ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि हमले की स्थिति में वह अमेरिकी ठिकानों और जहाजों को निशाना बनाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के पास करीब 2000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं और कई लॉन्चिंग साइट पहाड़ों के भीतर हैं. बड़ी संख्या में मिसाइल दागे जाने पर अमेरिकी और इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ सकता है.
अगर अमेरिका सीधे सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को निशाना बनाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून के गंभीर उल्लंघन का मामला बन सकता है. इससे लंबा सैन्य टकराव शुरू होने का खतरा रहेगा. साथ ही सत्ता परिवर्तन की कोई गारंटी नहीं है. खामेनेई पहले ही उत्तराधिकार की व्यवस्था कर चुके हैं, जिससे शासन तंत्र के बने रहने की संभावना मजबूत है.