नई दिल्ली: ईरान में 2026 की शुरुआत से महंगाई, मुद्रा गिरने और आर्थिक संकट को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं. इन हालात के बीच ईरान के इतिहास और खासकर महिलाओं की स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है. लोग जानना चाहते हैं कि इस्लाम आने से पहले ईरान में महिलाएं कैसे रहती थीं और उन्हें कितनी आजादी हासिल थी.
इतिहास बताता है कि इस्लाम से पहले ईरान का समाज पूरी तरह अलग था और महिलाओं की भूमिका केवल घर तक सीमित नहीं थी. सातवीं सदी में अरबों की जीत से पहले ईरान में मुख्य रूप से पारसी धर्म का प्रभाव था. पारसी दर्शन में सच्चाई, नैतिक चुनाव और आध्यात्मिक समानता को बहुत महत्व दिया जाता था.
इसी सोच का असर समाज पर भी दिखता था. हालांकि ईरानी समाज पितृसत्तात्मक था, लेकिन महिलाएं पूरी तरह कमजोर या अधिकारहीन नहीं थीं. ससानियन साम्राज्य के दौर में महिलाओं को कानूनी अधिकार प्राप्त थे. वे संपत्ति की मालिक बन सकती थीं और धन विरासत में पा सकती थीं.
महिलाओं को जमीन खरीदने और बेचने की अनुमति थी और वे व्यापार भी कर सकती थीं. कानूनी विवादों में महिलाएं अदालत में गवाही दे सकती थीं. कई मामलों में महिलाएं परिवार की संपत्ति को अकेले संभालने का अधिकार भी रखती थीं.
ईरानी इतिहास में महिला शासकों का उल्लेख भी मिलता है. सातवीं सदी में रानी बोरान और रानी अजरमिदोख्त ससानियन साम्राज्य की शासक रहीं. यह उस दौर में महिलाओं की राजनीतिक शक्ति को दर्शाता है. शाही और कुलीन परिवारों की महिलाओं को औपचारिक शिक्षा दी जाती थी. ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार कुछ महिलाएं डॉक्टर, प्रशासक और सैन्य अधिकारी के रूप में भी काम करती थीं.
सामाजिक रीति रिवाजों की बात करें तो पर्दा इस्लाम से पहले भी मौजूद था. इसे घशियेह कहा जाता था और यह अनिवार्य नहीं था. यह मुख्य रूप से कुलीन वर्ग की महिलाओं के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था. आम महिलाएं जैसे किसान, कारीगर और व्यापारी बिना पर्दे के सार्वजनिक स्थानों पर स्वतंत्र रूप से घूमती थीं.
पारसी धर्म में पुरुषों और महिलाओं को आध्यात्मिक रूप से समान माना जाता था. महिलाएं धार्मिक अनुष्ठानों, अग्नि मंदिरों और सामुदायिक पूजा में भाग ले सकती थीं.नैतिक जिम्मेदारियां भी लिंग भेद के बिना तय की जाती थीं. इतिहास बताता है कि इस्लाम से पहले ईरान में महिलाओं को समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति में अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता मिली हुई थी.