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India Daily

1000 साल बाद भारत लौटी खोई हुई धरोहर, नीदरलैंड्स से चोल वंश की तांबे की प्लेटें आई वापस; जानें इसका इतिहास

नीदरलैंड ने 11वीं सदी की चोल साम्राज्य की 21 ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें भारत को लौटा दीं. यह वापसी पीएम मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान हुई.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
1000 साल बाद भारत लौटी खोई हुई धरोहर, नीदरलैंड्स से चोल वंश की तांबे की प्लेटें आई वापस; जानें इसका इतिहास
Courtesy: @MEAIndia x account

नई दिल्ली: करीब 1000 साल पुरानी चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें आखिरकार भारत लौट आई हैं. नीदरलैंड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में 11वीं सदी की इन दुर्लभ प्लेटों को भारत को सौंप दिया. इसे दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती और भारत की सांस्कृतिक विरासत की बड़ी जीत माना जा रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी शुक्रवार को नीदरलैंड्स पहुंचे थे. यह उनकी पांच देशों की यात्रा का दूसरा चरण है. इससे पहले वह UAE गए थे. उनके दौरे में आगे स्वीडन, नॉर्वे और इटली भी शामिल हैं.

भारत कब से कर रहा था इसकी मांग?

भारत साल 2012 से इन अनैमंगलम कॉपर प्लेट्स की वापसी की मांग कर रहा था. नीदरलैंड में इन्हें लीडेन प्लेटें के नाम से जाना जाता है. कुल 21 तांबे की प्लेटें चोल साम्राज्य के सबसे अहम ऐतिहासिक दस्तावेजों में मानी जाती हैं और तमिल विरासत की महत्वपूर्ण निशानी हैं.

क्या है इन प्लेटों का इतिहास?

ये प्लेटें राजराजा चोल प्रथम के शासनकाल से जुड़ी हैं. इनका वजन करीब 30 किलोग्राम है और इन्हें एक कांस्य रिंग से बांधा गया है, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर बनी हुई है.

इन प्लेटों को दो हिस्सों में बांटा गया है. एक हिस्से में संस्कृत भाषा में लेख है, जबकि दूसरे हिस्से में तमिल भाषा में जानकारी दर्ज है. बताया जाता है कि राजराजा चोल प्रथम ने बौद्ध मठ को राजस्व देने का आदेश दिया था, जिसे पहले ताड़ के पत्तों पर लिखा गया. बाद में उनके बेटे राजराजा चोल प्रथम ने इसे स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाया.

इन प्लेटों को 1700 के दशक में फ्लोरेंटियस कैंपर नाम का एक मिशनरी नीदरलैंड ले गया था. उस समय नागपट्टिनम डच नियंत्रण में था.

कैसे आया वापस?

वापसी की प्रक्रिया तब तेज हुई जब वापसी और प्रतिस्थापन पर अंतर-सरकारी समिति ने माना कि इन प्लेटों पर भारत का दावा सही है. इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत हुई और आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान इन्हें भारत को लौटा दिया गया. यह कदम भारत की सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने की दिशा में बड़ी सफलता माना जा रहा है.