अमेरिका-इजरायल और ईरान की लड़ाई अब केवल उन तक सीमित नहीं रही. यह लड़ाई अब वैश्विक लड़ाई बन चुकी है. तेल बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर असर पड़ने लगा है. इस युद्ध में ईरान के साथ-साथ अब अमेरिकी की भी मुसीबत बढ़ रही है. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी स्थिति को मान नहीं रहे हैं. वहीं ईरान ने यह ऐलान कर दिया है कि अब उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. तो चलिए जानते हैं, इस युद्ध के खास साइडइफेक्ट के बारे में.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमेशा दुनिया के सामने खुद को शांति दूत बताया है. लेकिन अब उनकी सच्चाई सामने आने लगी है. शायद जब ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध लड़ने की सोची होगी तब शायद उन्होंने यह अनुमान नहीं लगाया हो कि यह उनके लिए इतना ज्यादा घातक होगा, लेकिन अब वह इस लड़ाई में फंसते ही जा रहे हैं.
युद्ध के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ रहा है. उनके देश में उनके खिलाफ आवाज उठ रहे हैं. नवंबर 2026 में मिडटर्म चुनाव होने हैं, अगर यह युद्ध नहीं रूका तो ट्रंप को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.
ब्रिक्स ग्रुप में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के अलावा सऊदी अरब, यूएई और ईरान भी शामिल हैं. इस बार इसकी अध्यक्षता भारत कर रहा है. मिडिल ईस्ट में चल रहे टेंशन का असर इस दौरान भी देखने को मिल सकता है. ईरान चाहेगा कि भारत समेत सभी देश अमेरिकी कार्रवाई पर सवाल उठाए अगर ऐसा नहीं हुआ तो ब्रिक्स के अंदर मतभेद हो सकते हैं.
नाटो, जिसे एक मजबूत संगठन माना जाता है उसपर भी इस युद्ध का दबाव बढ़ता ही जा रहा है. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोप के बीच पहले से ही तनाव था, इसी बीच ईरान संकट ने इसे और बढ़ा दिया है. इटली, स्पेन और फ्रांस जैसे देश ने पहले ही इस कार्रवाई का विरोध किया है. ईरान द्वारा नाटो बेस पर किया गया हमला स्थिति को गंभीर बना दिया है. अगर नाटो युद्ध में शामिल होता है तो स्थिति बिगड़ सकती है.
खाड़ी देशों द्वारा अमेरिका पर दबाव बनाया जा रहा है. उन्होंने इस युद्ध का हिस्सा बनने पर असहमति जताई है. क्योंकि उन्हें अब ऐसा लगने लगा है कि अमेरिका के लिए हमेशा से इजरायल मेन टॉपिक रहा है, मिडिल ईस्ट के लिए ट्रंप को खास चिंता नहीं है. ऐसे में सऊदी और यूएई जैसे देश अब काफी सतर्कता के साथ कदम उठा रहे हैं.
ईरान की लड़ाई में रूस की स्थिति मजबूत नजर आ रही है. एक ओर ईरान के हमलों से पूरे विश्व में ऊर्जा की चिंता बढ़ गई है, तेल की कीमतें भी बढ़ने लगी है वहीं रूस को इसका फायदा मिल रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से तेल आयात करने वालों की चिंता और तेल बेचने वाले देशों की कमाई बढ़ जाती है. रूस अब वैश्विक मंच पर सुर ऊंचे कर रहा है. कुल मिलाकर अब इस लड़ाई से घाटा केवल ईरान का नहीं रहा बल्कि यूरोप, एशिया, मिडिल ईस्ट और अमेरिका का भी हो रहा है.