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India Daily

कड़ाके की ठंड...लगातार 4 महीने की काली रात में कैसे रहते हैं लोग? इस द्वीप पर इंसानों से ज्यादा रहते हैं भालू

लॉन्गइयरबायेन में लोग चार महीने की पोलर नाइट के दौरान सामूहिक जीवन, त्योहारों और आपसी सहयोग से अंधेरे को उत्सव में बदल देते हैं.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
कड़ाके की ठंड...लगातार 4 महीने की काली रात में कैसे रहते हैं लोग? इस द्वीप पर इंसानों से ज्यादा रहते हैं भालू
Courtesy: @visualsofearth1 and @WorldClassFacts x account

नई दिल्ली: नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीप पर स्थित लॉन्गइयरबायेन दुनिया की उन गिनी चुनी जगहों में से एक है जहां हर साल करीब 3000 घंटे तक सूरज नहीं निकलता है. नवंबर से फरवरी तक यहां पोलर नाइट रहती है, जिसमें दिन और रात का फर्क लगभग खत्म हो जाता है. इस दौरान सुबह दस बजे हो या रात दो बजे, आसमान हमेशा अंधेरे में डूबा रहता है और केवल तारे व नॉर्दर्न लाइट्स ही रोशनी का सहारा बनते हैं. 

करीब 2500 की आबादी वाले इस कस्बे में लोग सूरज की गैरमौजूदगी के बावजूद सामान्य जीवन जीते हैं. यहां के लोगों की दिनचर्या सूरज से नहीं बल्कि घड़ियों से तय होती है. शरीर को एक्टिव रखने के लिए लोग विटामिन डी सप्लीमेंट और लाइट थेरेपी लैंप का इस्तेमाल करते हैं. 

अंधेरे की वजह से क्या-क्या होती हैं दिक्कतें?

लंबे अंधेरे की वजह से मानसिक तनाव और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन इससे निपटने के लिए लोग कोसेलिग नाम की जीवनशैली अपनाते हैं. इसमें घरों को गर्म रोशनी, मोमबत्तियों, ऊनी कंबलों और संगीत से सजाया जाता है ताकि सुकून बना रहे. 

लॉन्गइयरबायेन में अकेलापन दूर करने के लिए सामूहिक भोज और कम्युनिटी डिनर का खास चलन है. यहां करीब 50 देशों के लोग रहते हैं, जो रिसर्च और माइनिंग जैसे कामों से जुड़े हैं. इतनी विविधता के बावजूद आपसी जुड़ाव बेहद मजबूत है. 

कैसी होती है सोशल लाइफ?

अंधेरे के महीनों में यहां की सोशल लाइफ और ज्यादा सक्रिय हो जाती है. लोग स्नोमोबाइल से बर्फीली वादियों में नॉर्दर्न लाइट्स देखने निकलते हैं और पोलर जैज जैसे म्यूजिक फेस्टिवल आयोजित किए जाते हैं.

इस द्वीप पर सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती है. यहां इंसानों से ज्यादा पोलर बीयर हैं, जो अंधेरे में ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं. इसलिए लोग बाहर निकलते समय राइफल, हेडलाइट और रिफ्लेक्टिव जैकेट पहनते हैं. सड़कों पर अजनबियों का एक दूसरे को हेलो कहना आम है, क्योंकि यहां हर इंसान दूसरे का सहारा बनता है.

कब निकलता है सूरज?

फरवरी के अंत में जब पहली बार सूरज की किरणें शहर की इमारतों पर पड़ती हैं, तो लोग सोलफेस्टुका मनाते हैं. यह पल भावुक कर देने वाला होता है और लोगों को याद दिलाता है कि अंधेरा चाहे कितना भी लंबा हो, उजाला लौटकर जरूर आता है.