पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक युवा छात्रा की अनोखी खोज ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. अमेरिका के वॉशिंगटन राज्य की रहने वाली 18 वर्षीय लक्ष्मी अग्रवाल ने जूट के कचरे से एक स्पेशल स्पंज विकसित किया है, जो जल प्रदूषण कम करने में बेहद प्रभावी साबित हुआ है.
लक्ष्मी अग्रवाल ने यह स्पंज जूट के पौधों से बचने वाले अपशिष्ट और उससे तैयार नैनोसेल्यूलोज की मदद से बनाया है. उनका उद्देश्य बारिश के दौरान सड़कों से बहकर नदियों और झीलों में पहुंचने वाले 6PPD-quinone नामक रासायनिक प्रदूषक को रोकना था. यह रसायन वाहन के टायरों में इस्तेमाल होने वाले एक पदार्थ से बनता है और कई अध्ययनों में इसे सैल्मन मछलियों की मौत का प्रमुख कारण बताया गया है. प्रयोगशाला परीक्षणों में इस स्पंज ने इस प्रदूषक को 80 प्रतिशत तक हटाने में सफलता हासिल की. साथ ही यह भारी धातुओं जैसे अन्य हानिकारक तत्वों को भी पानी से अलग करने में सक्षम पाया गया.
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह जैविक और पर्यावरण के अनुकूल है. शोध के अनुसार, इस स्पंज के निर्माण में पारंपरिक फिल्टर प्रणालियों की तुलना में लगभग 85 प्रतिशत कम ऊर्जा खर्च होती है, जबकि उत्पादन लागत करीब 98 प्रतिशत तक घट जाती है. कम लागत और आसान निर्माण प्रक्रिया इसे भविष्य में सड़क किनारे जल निकासी प्रणालियों और वर्षा जल शोधन परियोजनाओं के लिए उपयोगी विकल्प बना सकती है. यदि बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल संभव हुआ तो जल प्रदूषण कम करने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है.
लक्ष्मी की इस खोज को 2026 के रेजेनरॉन इंटरनेशनल साइंस एंड इंजीनियरिंग फेयर (ISEF) में सर्वोच्च सम्मान मिला. दुनिया की सबसे बड़ी प्री-कॉलेज विज्ञान प्रतियोगिता में 64 देशों और क्षेत्रों से 1,700 से अधिक छात्र शामिल हुए थे. जजों ने उनकी परियोजना की सराहना इसलिए की क्योंकि इसमें कम कीमत वाले कृषि अपशिष्ट को पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी समाधान में बदल दिया गया. इस उपलब्धि पर उन्हें 75 हजार डॉलर का प्रतिष्ठित रेजेनरॉन यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड प्रदान किया गया.
फिलहाल इस तकनीक का परीक्षण प्रयोगशाला तक सीमित है, लेकिन शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक माने जा रहे हैं. यदि आगामी फील्ड परीक्षण भी सफल रहते हैं तो यह तकनीक नदियों, झीलों और पेयजल स्रोतों को टायरों से होने वाले प्रदूषण से बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है. लक्ष्मी अग्रवाल की यह उपलब्धि दिखाती है कि नई सोच और वैज्ञानिक नवाचार के जरिए युवा शोधकर्ता भी वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रभावी समाधान खोज सकते हैं.