नई दिल्ली: जापान के दक्षिणी कुमामोटो प्रांत में मंगलवार को आए 7.1 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी. झटकों के बाद जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने सुनामी की चेतावनी जारी करते हुए तटीय इलाकों के लोगों से तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की. भूकंप का असर कई प्रांतों तक महसूस किया गया. प्रशासन ने राहत और निगरानी अभियान शुरू कर दिया है, जबकि बिजली और परिवहन सेवाओं पर भी इसका असर पड़ा है.
ऐसे में यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर दुनिया में सबसे ज्यादा भूकंप जापान में ही क्यों आते हैं? इसका जवाब जापान की भौगोलिक स्थिति और पृथ्वी की बनावट में छिपा है. वैज्ञानिकों के अनुसार जापान ऐसी जगह पर स्थित है, जहां पृथ्वी की कई बड़ी टेक्टोनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे से टकराती और खिसकती रहती हैं. यही वजह है कि यहां छोटे-बड़े भूकंप आम बात हैं.
पृथ्वी की ऊपरी सतह कई विशाल चट्टानी प्लेटों से बनी है, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट कहा जाता है. जापान के आसपास प्रशांत प्लेट, फिलीपीन सागर प्लेट, यूरेशियन प्लेट और ओखोत्स्क (उत्तर अमेरिकी) प्लेट मौजूद हैं. ये प्लेटें हर साल कुछ सेंटीमीटर की गति से खिसकती रहती हैं. जब इनके बीच दबाव बहुत बढ़ जाता है और चट्टानें अचानक खिसकती हैं, तब भूकंप आता है.
जापान प्रशांत महासागर के उस क्षेत्र में स्थित है जिसे 'पैसिफिक रिंग ऑफ फायर' कहा जाता है. यह दुनिया का सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र माना जाता है. यहां लगातार प्लेटों की हलचल होती रहती है, जिसके कारण दुनिया के अधिकांश बड़े भूकंप और कई ज्वालामुखी विस्फोट इसी क्षेत्र में दर्ज किए जाते हैं. यही कारण है कि जापान में भूकंप आने की संभावना हमेशा बनी रहती है.
जापान के पूर्वी और दक्षिणी समुद्री क्षेत्रों में एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती रहती है. इस प्रक्रिया को 'सबडक्शन' कहा जाता है. वर्षों तक दबाव जमा होने के बाद जब चट्टानें अचानक टूटती या खिसकती हैं, तो तेज भूकंप आता है. यदि यह घटना समुद्र के भीतर होती है, तो सुनामी का खतरा भी पैदा हो जाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार जापान में हर वर्ष लगभग 1,500 ऐसे भूकंप दर्ज किए जाते हैं जिन्हें लोग महसूस कर सकते हैं. इसके अलावा हजारों छोटे झटके केवल वैज्ञानिक उपकरणों में दर्ज होते हैं. हालांकि इनमें से अधिकांश भूकंप नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन समय-समय पर शक्तिशाली भूकंप भी आते हैं जो बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकते हैं.
बार-बार भूकंप आने के बावजूद जापान ने मजबूत आपदा प्रबंधन प्रणाली विकसित की है. यहां भूकंपरोधी इमारतें बनाई जाती हैं, हाई-स्पीड ट्रेनें शुरुआती झटकों का संकेत मिलते ही अपने आप रुक जाती हैं, गैस और बिजली की आपूर्ति नियंत्रित कर दी जाती है तथा मोबाइल फोन पर कुछ सेकंड पहले चेतावनी भेज दी जाती है. स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक स्थानों पर नियमित मॉक ड्रिल भी कराई जाती है, जिससे लोग आपदा के समय घबराने के बजाय सही कदम उठा सकें.
विज्ञान ने भूकंप की निगरानी में बड़ी प्रगति की है, लेकिन आज भी कोई वैज्ञानिक यह सटीक नहीं बता सकता कि भूकंप कब, कहां और कितनी तीव्रता का आएगा. हालांकि जापान का अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम शुरुआती कंपन का पता लगाकर कुछ सेकंड पहले अलर्ट जारी कर देता है. यही कुछ सेकंड हजारों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं.