नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी जंग ने ईरान को गहरे जख्म दिए हैं. 18 दिनों के भीतर देश ने अपने कई बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों को खो दिया है. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अली खामेनेई की जंग के पहले ही दिन मौत हो गई. इसके बाद एक के बाद एक हमलों में शीर्ष कमांडरों के मारे जाने से ईरान की रणनीतिक ताकत कमजोर हुई है. इसके बावजूद ईरान ने जवाबी हमलों से अपने इरादे साफ कर दिए हैं.
28 फरवरी को हुए हमलों में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत ने पूरे देश को हिला दिया. उनके साथ अली शमखानी भी मारे गए, जो उनके करीबी सलाहकार थे. इस हमले में मोहम्मद पाकपुर, अजीज नासिरजादेह और अब्दुल रहीम मूसावी की भी मौत हुई. एक ही हमले में इतने बड़े नेताओं का जाना ईरान के लिए बड़ा झटका साबित हुआ.
पहले हमले के बाद भी हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कई जगहों पर हमले किए, लेकिन इसी बीच उसके कई अहम अधिकारी निशाना बनते रहे. लगातार हो रहे हमलों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व में अचानक आई कमी ने हालात को और जटिल बना दिया है.
17 मार्च को एक और बड़ा हमला हुआ, जिसमें अली लारीजानी मारे गए. उनके साथ उनके बेटे की भी हत्या कर दी गई. उसी दिन घोलमरेजा सोलेमानी की भी मौत हो गई. इसके बाद खुफिया मंत्री इस्माइल खतीब के मारे जाने की खबर आई. इन घटनाओं ने ईरान को और कमजोर कर दिया.
लगातार नुकसान के बावजूद ईरान पीछे हटने के मूड में नहीं है. माना जा रहा है कि वह इस जंग को लंबा खींचने की रणनीति पर काम कर रहा है. ईरान का मानना है कि यदि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों को लंबे समय तक उलझाए रखेगा, तो वह दबाव बना सकता है. इस बीच मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और हालात जल्द सामान्य होते नहीं दिख रहे.