नई दिल्ली: NASA की पूर्व वैज्ञानिक इंग्रिड होंकाला का दावा है कि वह सिर्फ एक बार नहीं बल्कि तीन बार ‘मरकर’ वापस आई हैं और हर बार उन्होंने मौत के बाद की उस रहस्यमयी दुनिया का अनुभव किया. कोलंबिया के बोगोटा की रहने वाली इंग्रिड बताती हैं कि मौत के करीब पहुंचने का उनका पहला अनुभव तब हुआ, जब वह सिर्फ दो साल की थीं.
अपने घर के पास बर्फ जैसे ठंडे पानी के एक टैंक में गिर जाने के बाद उनका दम घुटने लगा था. वह बताती हैं कि उस जमा देने वाले पानी में सांस लेने के लिए चल रही जबरदस्त जद्दोजहद के बीच अचानक उन्हें एक गहरी शांति का अनुभव हुआ. वह कहती हैं, 'मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं अपने ही शरीर से बाहर आ गई हूं.'
एक इंटरव्यू में इंग्रिड ने बताया कि जब वह अपने शरीर से बाहर थीं, तो उन्होंने देखा कि उनकी मां घर से निकलकर अपने दफ्तर की ओर जा रही हैं. उन्होंने अपनी मां से ‘टेलीपैथी’ यानी बिना बोले मन की बात पहुंचाने की शक्ति के जरिए संपर्क किया. यह महसूस करते ही कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है, उनकी मां तुरंत घर वापस लौटीं, उन्हें बर्फ जैसे ठंडे पानी के टैंक से बाहर निकाला और उनकी जान बचा ली.
अब 55 साल की हो चुकीं इंग्रिड कहती हैं कि मौत कोई ऐसी चीज नहीं है जिससे डरा जाए. उनके मुताबिक उस ‘दूसरी दुनिया’ में समय का कोई अस्तित्व ही नहीं था. उन्होंने खुद को एक बच्ची के रूप में नहीं, बल्कि ‘रोशनी की एक किरण’ के रूप में महसूस किया. उन्हें यह एहसास हुआ कि इस पूरे ब्रह्मांड की हर चीज आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. उन्होंने कुछ ‘दिव्य शक्तियों’ से भी बातचीत की.
इंग्रिड की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. 25 साल की उम्र में एक भयानक मोटरसाइकिल दुर्घटना के बाद और फिर 52 साल की उम्र में जब एक सर्जरी के दौरान उनका ब्लड प्रेशर अचानक बहुत ज्यादा गिर गया था. वह बताती हैं, 'हर बार, मैं उसी गहरी शांति वाली अवस्था में वापस पहुंच जाती थी.' सच कहूं तो, वह आगे कहती हैं, 'अब मुझे मौत का जरा भी डर नहीं लगता.'
जहां कुछ लोग इन घटनाओं को ऑक्सीजन की कमी से होने वाला महज एक भ्रम मानकर खारिज कर देते हैं, वहीं इंग्रिड ने अपने वैज्ञानिक करियर को इन गहरे अनुभवों से अटूट रूप से जोड़ लिया है. इंग्रिड जिनके पास मरीन साइंस में PhD की डिग्री है और जिन्होंने NASA और U.S. Navy दोनों के साथ काम किया है उनका पक्का मानना है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
अपनी आने वाली किताब Dying to See the Light में वह लिखती हैं, 'हमारी चेतना सिर्फ दिमाग से ही पैदा नहीं होती बल्कि यह ब्रह्मांड का एक बुनियादी हिस्सा है. मौत कोई अंत नहीं है बल्कि यह चेतना का एक रूप से दूसरे रूप में बदलना है.'