आज हम दुनिया के उस ब्लैक होल की चर्चा करेंगे, जिसे भूगोल में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कहते हैं. राजनीतिक नजरिए से यह अब सत्ताओं का कब्रिस्तान बन चुका है. लोग कहते हैं कि बरमूडा ट्रायंगल में जहाज रहस्यमयी तरीके से गायब होते हैं लेकिन होर्मुज में तो सीधे तौर पर राष्ट्राध्यक्षों का भविष्य ही गायब हो रहा है. इतिहास गवाह है कि जिसने भी होर्मुज की नब्ज को ताकत से दबाने की कोशिश की, उसकी अपनी कुर्सी डोल गई. आज 2026 में यही दुनिया की हकीकत है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर बम बरसाए थे. उन्हें लगा था कि तेल सस्ता होगा लेकिन अमेरिका में पेट्रोल 4.48 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गया. इस भयंकर महंगाई ने ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग को पाताल में पहुंचा दिया है. आने वाले नवंबर के चुनाव उनके लिए काल बन चुके हैं.
यही बुरा हाल इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का भी हो चुका है. युद्ध भड़काने वाले नेतन्याहू आज खुद भ्रष्टाचार और भारी घरेलू विरोध के गहरे दलदल में ऐसे फंसे हैं कि बाहर निकलना मुश्किल है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि अक्टूबर 2027 तक उनकी राजनीतिक विदाई पूरी तरह तय मानी जा रही है.
यूरोप के बड़े नेताओं का भी यही हाल है. ब्रिटेन के कीर स्टार्मर हों या फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों, होर्मुज में युद्धपोत भेजते ही इनके घर में ही भारी बगावत शुरू हो गई है. ब्रिटेन के 70 से ज्यादा सांसद खुलकर स्टार्मर का इस्तीफा मांग रहे हैं. वहीं फ्रांस में मैक्रों अपनी अलोकप्रियता के नए रिकॉर्ड बना रहे हैं. आम जनता महंगाई और युद्ध की नीतियों से त्रस्त है, जिससे इन दोनों शक्तिशाली नेताओं की कुर्सी खतरे में पड़ गई है और इनका राजनीतिक भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा है.
इसका सीधा तर्क यह है कि जब होर्मुज बंद होता है, तो दुनिया भर में तेल महंगा होता है और तेल महंगा होने पर आम आदमी की जेब जलती है. जब जेब जलती है, तो क्रोधित वोटर अपनी सरकार को जलाकर राख कर देता है. ईरान ने होर्मुज को अपना एक 'बिना परमाणु वाला परमाणु हथियार' बना लिया है. जो भी इसे तोड़ने गया, वो खुद ही टूट गया. यह सत्ता का एक ऐसा खूनी भंवर है, जो बड़ी-बड़ी ताकतवर सरकारों को अपने भीतर खींचकर पूरी तरह खत्म कर रहा है.