अमेरिका-ईरान युद्ध को शुरू हुए अब छह महीने से ज्यादा हो चुके हैं. हालांकि अब भी दोनों ओर से तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा है. इस युद्ध से न केवल मीडिल ईस्ट प्रभावित हुआ है, बल्कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है. वैश्विक ऊर्जा बाजार में कुछ बदलाव ऐसे भी हुए हैं, जो शायद जंग खत्म होने के बाद भी पहले की तरह न हो पाए. तो चलिए जानते हैं कि इस युद्ध की वजह से क्या-क्या बदलाव आए हैं.
मिडिल ईस्ट तनाव का सबसे पहला असर तेल की कीमतों पर पड़ा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में गैसोलीन की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन से भी ऊपर पहुंच चुकी है. इसकी वजह से शिपिंग की भी लागत बढ़ गई है. युद्ध समाप्त होने के बाद शायद तेल के दाम में थोड़ा गिरावट आए, लेकिन मिडिल ईस्ट देशों पर निर्भरता कम हो सकती है.
ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय होर्मुज रहा. होर्मुज के प्रभावित होने की वजह से वैश्विक तेल सप्लाई चेन पर असर पड़ा. जिस रास्ते से हर दिन लाखों बैरल तेल का सप्लाई होती थी, वह खतरे का निशान बन गया. अचानक आई इस परेशानी के बाद कंपनियां वैकल्पिक रास्ते तलाशने को मजबूर हो गई. इस रास्ते को अब असुरक्षित माना जाने लगा है. वहीं ईरान इस रास्ते पर टैक्स लगाने की तैयारी में है, जिसकी वजह से यह रास्ता जो युद्ध से पहले तक बिल्कुल सामान्य था अब वह वापस उस स्थिति पर शायद नहीं आ पाएगा.
चीन के पास बड़े तेल भंडार होने के कारण वह बाहरी आपूर्ति में रुकावट के दौरान अपने जमा भंडार का इस्तेमाल कर सकता है. इससे मिडिल ईस्ट से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने का तत्काल असर कुछ हद तक कम हुआ है. इसके अलावा चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. अगर यह बदलाव लंबे समय तक जारी रहा तो वैश्विक तेल मांग के पुराने स्तर पर लौटना मुश्किल हो सकता है.
इस युद्ध की वजह से जब तेल सप्लाई चेन प्रभावित हुआ तो सभी देशों का ध्यान अचानक तेल उत्पादन की ओर गया. इसी दौरान ब्राजील, गुयाना, कनाडा और नॉर्वे जैसे देशों को उत्पादन बढ़ाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया. अमेरिका में भी कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ा है. इससे मिडिल ईस्ट पर तेल की निर्भरता कम हो सकती है.