बेंगलुरु: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी होता है. अगर बीमारी की पहचान शुरुआती स्टेज में हो जाए तो इलाज के विकल्प बेहतर हो सकते हैं. इसी दिशा में वैज्ञानिक कुत्तों की सूंघने की क्षमता का इस्तेमाल करके कैंसर के शुरुआती संकेत पहचानने की तकनीक पर काम कर रहे हैं. बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी कुत्तों की सूंघने की क्षमता को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI से जोड़कर इस तकनीक को विकसित कर रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक इस रिसर्च का फेज 2 ट्रायल सफल रहा है और इसके नतीजे जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किए गए हैं. रिसर्च का मकसद यह पता लगाना है कि क्या प्रशिक्षित कुत्ते इंसानों के शरीर से निकलने वाली गंध में कैंसर से जुड़े बदलावों को पहचान सकते हैं.
दरअसल, शरीर में कैंसर समेत कई बीमारियों के दौरान जैविक और रासायनिक बदलाव हो सकते हैं. इन बदलावों की वजह से सांस, पसीने या शरीर से निकलने वाली गंध में कुछ खास पैटर्न बन सकते हैं. इंसान की नाक इन बेहद सूक्ष्म बदलावों को आसानी से नहीं पहचान पाती लेकिन कुत्तों की सूंघने की क्षमता काफी ज्यादा संवेदनशील होती है. इसी वजह से लंबे समय से कुत्तों की मदद से बीमारियों के संकेत पहचानने को लेकर शोध किया जा रहा है.
बेंगलुरु में करीब 15 प्रशिक्षित कुत्तों के साथ इस तकनीक पर काम किया जा रहा है. इनमें लैब्राडोर समेत दूसरे कुत्ते शामिल हैं. इन्हें मरीजों के सैंपल में मौजूद खास गंध के पैटर्न पहचानने की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके लिए मरीज करीब 10 मिनट तक एक कॉटन मास्क में सांस लेते हैं. इसके बाद मास्क को सील करके लैब में भेज दिया जाता है. मरीजों का सीधे कुत्तों से संपर्क नहीं होता है.
कुत्ते जब सैंपल को सूंघते हैं तो उनकी अलग अलग प्रतिक्रियाओं को सेंसर के जरिए रिकॉर्ड किया जाता है. कोई कुत्ता फीडर की ओर जाता है, कोई रुक जाता है तो कोई सैंपल को पंजे से छूता है. इन प्रतिक्रियाओं को AI सिस्टम डेटा में बदलकर उसका विश्लेषण करता है.
कंपनी के अनुसार कर्नाटक के छह अस्पतालों में 1,500 से ज्यादा लोगों को शामिल करके किए गए रिसर्च में सात तरह के कैंसर की पहचान में 90 फीसदी से ज्यादा सफलता मिली. हालांकि, इस आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि कुत्ते कैंसर की पक्की जांच कर सकते हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक यह तकनीक शुरुआती पहचान के लिए एक अतिरिक्त टूल के तौर पर उपयोगी साबित हो सकती है, लेकिन अभी इसे सामान्य कैंसर जांच का विकल्प नहीं माना जा सकता.