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‘शर्त मानी तो ही बात होगी…” ईरान ने महाचर्चा से पहले US के सामने रखी शर्त

अमेरिका के साथ अहम शांति वार्ता के लिए शुक्रवार को एक उच्च-स्तरीय ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंचा. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालिबफ कर रहे हैं.

Shilpa Shrivastava
‘शर्त मानी तो ही बात होगी…” ईरान ने महाचर्चा से पहले US के सामने रखी शर्त
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: अमेरिका के साथ शांति वार्ता के लिए उच्च-स्तरीय ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंच चुका है. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालिबफ कर रहे हैं. इसमें विदेश मंत्री अब्बास अराकची, सर्वोच्च राष्ट्रीय रक्षा परिषद के सचिव अली अकबर अहमदीन और सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती जैसे टॉप अधिकारी शामिल हैं.

क्या है ईरान की शर्त: वार्ता से पहले ईरान ने यह साफ कर दिया है कि ये बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका उसकी सारी मांगे मान लेगा. खासतौर से लेबनान में इजराइली हमलों को रोकना और ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना. ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने अधिकार को मान्यता देने की भी मांग की है. इसके साथ ही वहां से गुजरने वाले जहाजों से पारगमन शुल्क वसूलने के अधिकार की भी मांग की है.

क्या चाहता है अमेरिका: 

बता दें कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जिनके साथ वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ भी हैं. अमेरिका ईरान से चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम के भंडार को छोड़ दे, परमाणु हथियार बनाना बंद कर दे, अपने मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करे और हिरासत में लिए गए अमेरिकी नागरिकों को रिहा करे. अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर किसी भी प्रकार के शुल्क का भी कड़ा विरोध किया है.

लेबनान को किया जाए सीजफायर में शामिल- ईरान

लेबनान में चल रहे संघर्ष के कारण स्थिति और भी ज्यादा मुश्किल हो गई है. ईरान चाहता है कि किसी भी सीजफायर में लेबनान को भी शामिल किया जाएगा और इजरायल की कर्रवाई भी रुक जाएं. जबकि इजराइल और अमेरिका का कहना है कि लेबनान मौजूदा अमेरिका-ईरान समझौते का हिस्सा नहीं है. इन सभी चुनौतियों के बावजूद, दोनों पक्षों ने बातचीत करने की इच्छा दिखाई है. इस्लामाबाद में आने वाले दिन बहुत महत्वपूर्ण होंगे. 

इन वार्ताओं में सफलता से एक दीर्घकालिक शांति समझौता हो सकता है. मिडिल-ईस्ट को स्थिर करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, विफलता की स्थिति में यह नाजुक संघर्ष-विराम टूट सकता है और इस क्षेत्र को वापस संघर्ष की ओर धकेल सकता है.