नई दिल्ली: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर इन दिनों एक विवादित बयान को लेकर आलोचनाओं में घिर गए हैं. संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में सवाल-जवाब के दौरान उन्होंने ऐसा मजाक किया, जिसे कई सांसदों और लोगों ने अनुचित और गैरजरूरी बताया. यह मामला ऐसे वक्त सामने आया है, जब लेबर सरकार पहले से ही अपनी नीतियों, फैसलों में बदलाव और देश की आर्थिक स्थिति को लेकर दबाव झेल रही है.
दरअसल, संसद में विपक्ष की ओर से सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए जा रहे थे. विपक्षी कंजर्वेटिव नेता केमी बेडनॉक ने लेबर सरकार पर बार-बार नीतियां बदलने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि सरकार के फैसलों में स्थिरता नहीं है और इससे जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है. इसी सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने एक टिप्पणी की, जिसने विवाद को जन्म दे दिया.
पीएम स्टार्मर ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि विपक्ष ने 14 साल में 'कामसूत्र' से भी ज्यादा बार अपनी पोजिशन बदली है. उन्होंने आगे यह भी कहा कि इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि विपक्ष थका हुआ नजर आता है, क्योंकि उसी ने देश की हालत खराब की है. इस टिप्पणी के बाद सदन में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया और कई सदस्य असहज महसूस करते दिखे.
"They had more positions in 14 years than the Kama Sutra. No wonder they're knackered, they left the country screwed!"
Sir Keir Starmer and opposition leader Kemi Badenoch clash over the latest Labour U-turn on mandatory digital IDs.https://t.co/tzckGWJRPH
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इस बयान के सामने आते ही विपक्ष ने तुरंत प्रधानमंत्री पर हमला बोला. कंजर्वेटिव नेताओं का कहना था कि इतने गंभीर मुद्दों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री को ठोस और जिम्मेदार जवाब देने चाहिए थे, न कि हल्के और विवादित मजाक. कई सांसदों ने इसे संसद की गरिमा के खिलाफ बताया और कहा कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल उचित नहीं है.
प्रधानमंत्री के इस बयान का असर सोशल मीडिया पर भी साफ देखने को मिला. बयान का वीडियो तेजी से वायरल हो गया और लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगी.कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि संसद जैसी जगह पर इस तरह की भाषा क्यों इस्तेमाल की गई. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ एक खराब मजाक नहीं था, बल्कि इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार मौजूदा हालात की गंभीरता को पूरी तरह समझ नहीं पा रही है.
यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है, जब लेबर सरकार पहले से ही कई मुद्दों पर आलोचनाओं का सामना कर रही है. खास तौर पर डिजिटल पहचान जैसे मामलों में सरकार के फैसलों में बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री न तो संसद के माहौल को सही तरीके से समझ पा रहे हैं और न ही जनता की असली चिंताओं पर फोकस कर पा रहे हैं.
नीतिगत मोर्चे पर भी सरकार के सामने मुश्किलें कम नहीं हैं. सत्ता में आने से पहले लेबर पार्टी ने हर साल तीन लाख नए घर बनाने का वादा किया था. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले करीब बीस सालों में कोई भी सरकार इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकी है. बढ़ती निर्माण लागत, मजदूरों की कमी और वित्तीय चुनौतियों के कारण यह लक्ष्य बेहद मुश्किल माना जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि चाहे सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, ब्रिटेन में हर साल औसतन डेढ़ लाख से भी कम घर ही बन पाए हैं. ऐसे में सरकार के सामने न केवल राजनीतिक बल्कि व्यावहारिक चुनौतियां भी खड़ी हैं.