menu-icon
India Daily

PoK में क्यों बह रहा है खून? जानिए 12 आरक्षित सीटों का पूरा विवाद जिसने सुलगाई हिंसा की आग

पीओके में 12 आरक्षित सीटों पर विवाद के कारण भीषण हिंसा भड़क उठी है.

Ashutosh
Edited By: Ashutosh Rai
PoK में क्यों बह रहा है खून? जानिए 12 आरक्षित सीटों का पूरा विवाद जिसने सुलगाई हिंसा की आग
Courtesy: X

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर इस समय गहरे राजनीतिक संकट और भयंकर हिंसा की आग में पूरी तरह झुलस रहा है. वहां की जम्मू-कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी ने सरकारी नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इस व्यापक जनाक्रोश की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंदन तक सुनाई दे रही है. इस ताजा विवाद की सबसे प्रमुख वजह आगामी चुनावों में शरणार्थियों के लिए आरक्षित की गई 12 सीटें हैं. इसका स्थानीय नागरिक बड़े पैमाने पर खुलकर कड़ा विरोध कर रहे हैं.

क्या है 12 सीटों का विवाद?

इस टकराव का पहला सिरा पीओके की विधानसभा में मौजूद 12 आरक्षित सीटें हैं. कुल 53 सीटों वाली इस विधानसभा में से 45 सीटों पर सीधे मतदान होता है, जिसमें से 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं जो 1947, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान विस्थापित होकर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रह रहे हैं. इनमें से 6 सीटें जम्मू से आए विस्थापितों और 6 सीटें कश्मीर घाटी के शरणार्थियों के लिए तय हैं. ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी का साफ आरोप है कि इस अनुचित व्यवस्था के कारण वहां के मूल निवासियों का असली राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद कमजोर पड़ जाता है. इस चुनावी व्यवस्था के चलते बाहरी ताकतों का दखल बढ़ता है और लोकतांत्रिक निष्पक्षता पूरी तरह खत्म हो जाती है.

मुजफ्फराबाद समझौते की अधूरी कहानी

इस कहानी का दूसरा सिरा पिछले साल अक्टूबर 2025 में हस्ताक्षरित हुए मुजफ्फराबाद समझौते से जुड़ता है, जो सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच लंबे संघर्ष के बाद हुआ था. उस समय प्रशासन ने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए गेहूं और बिजली पर भारी सब्सिडी देने, बुनियादी ढांचे को सुधारने और आंदोलन में मारे गए लोगों के परिवारों को उचित मुआवजा देने जैसे कई बड़े वादे किए थे. जेएएसी का आरोप है कि सरकार ने इन सभी आश्वासनों को ठंडे बस्ते में डाल दिया और कोई भी वादा जमीन पर सच नहीं हो सका. वहीं दूसरी तरफ, सरकारी अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने अधिकांश बुनियादी मांगें मान ली हैं लेकिन आरक्षित सीटों और विशेष राजनीतिक विशेषाधिकारों जैसे नीतिगत मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती चली गई. इसके साथ ही जनता महंगाई, बेरोजगारी और बिजली संकट से भी बेहद त्रस्त है.

नौ जून की हड़ताल

इसी टालमटोल और गहरे अविश्वास के कारण संगठन ने 9 जून से पूरे क्षेत्र में पूर्ण हड़ताल और चक्का जाम का ऐतिहासिक आह्वान किया, जिसने देखते ही देखते हिंसक रूप अख्तियार कर लिया. इस स्थानीय आंदोलन की तपिश अब भौगोलिक सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण लंदन में देखने को मिला. वहां स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर सैकड़ों की संख्या में विस्थापित नागरिकों और समर्थकों ने एकजुट होकर पाकिस्तानी सेना और सरकार के क्रूर दमन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. प्रदर्शनकारियों ने बैनर-पोस्टर हाथों में लेकर मानवाधिकारों के खुले उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया और वैश्विक संस्थाओं से इस मामले में तुरंत दखल देने की अपील की, क्योंकि जनता की जायज मांगों को बातचीत के बजाय बंदूकों के दम पर दबाया जा रहा है.

भविष्य का सबक

एक तरफ जहां पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना अपने राजनीतिक वर्चस्व को छोड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता भी अपने अधिकारों और स्वायत्तता के लिए खून बहाने पर आमादा है. इस टकराव को बातचीत के माध्यम से समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो दोनों पक्षों की यह जिद पूरे क्षेत्र को पूरी तरह तबाह कर देगी. इस खूनी संघर्ष से यह साफ संदेश मिलता है कि जनता की जायज आर्थिक और राजनीतिक शिकायतों को दबाकर कोई भी हुकूमत लंबे समय तक शांति स्थापित नहीं रख सकती और इस जिद का अंत केवल बर्बादी ही होता है.